जागरण गीत कविता के प्रश्न उत्तर Class 7 ॥ Jagran Geet Question Answer Class 7
सोहनलाल द्विवेदी का जीवन परिचय
सुकवि श्री सोहनलाल द्विवेदी का जन्म सन् 1905 ई० में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद के अंतर्गत बिंदकी नामक गाँव में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता एक धार्मिक और संस्कारवान व्यक्ति थे, जिनके संस्कारों ने द्विवेदी जी के व्यक्तित्व को अत्यंत ऊँचाई प्रदान की। बाल्यकाल से ही वे अत्यंत मेधावी और गंभीर स्वभाव के थे। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने उच्च शिक्षा पूर्ण की और साहित्य तथा देशसेवा दोनों में समान रूप से रुचि ली।
उनके जीवन पर पंडित मदन मोहन मालवीय जी के संपर्क का गहरा प्रभाव पड़ा। मालवीय जी से प्रभावित होकर उनके हृदय में देशभक्ति, मानवता और राष्ट्रीय एकता की भावना प्रबल हुई। इसी प्रेरणा ने उन्हें साहित्य की ओर प्रेरित किया। वे महात्मा गाँधी के सिद्धांतों से भी अत्यंत प्रभावित थे और उन्होंने अपने काव्य में गाँधीवादी विचारधारा को अभिव्यक्ति दी। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि एक सच्चे देशभक्त और कर्मयोगी भी थे। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया और अपने लेखन से जनता में जागृति उत्पन्न की।
द्विवेदी जी की कविताओं में देशभक्ति, जनसेवा, ग्रामोदय, मानवता, नारी सम्मान तथा सांस्कृतिक चेतना की भावनाएँ प्रमुखता से दिखाई देती हैं। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की आत्मा और समाज सुधार की गहरी आकांक्षा झलकती है। उनकी कविताएँ पाठकों में उत्साह, साहस और कर्त्तव्यनिष्ठा का भाव उत्पन्न करती हैं।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — भैरवी, पूजा गीत, सेवाग्राम, प्रभाती, जय भारत जय, कुणाल, वासवदता, तथा वासंती। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई बालोपयोगी कविताएँ भी लिखीं जो सरल भाषा, मधुर भावनाओं और प्रेरणादायक विचारों से परिपूर्ण हैं।
उनकी भाषा अत्यंत सरल, सहज, प्रभावशाली और बोधगम्य है। द्विवेदी जी का काव्य राष्ट्रीयता, आदर्शवाद और मानवता का सुंदर संगम है। उन्होंने साहित्य को समाज सुधार का साधन माना और अपने लेखन से लोगों में देश के प्रति निष्ठा और गर्व की भावना जाग्रत की।
सन् 1988 ई० में इस महान कवि का देहावसान हो गया। परंतु उनकी रचनाएँ आज भी भारतवासियों के हृदय में देशप्रेम, नैतिकता और सेवा-भावना की ज्योति जलाए हुए हैं। वे सदा एक प्रेरणादायी कवि और कर्मयोगी के रूप में स्मरण किए जाते रहेंगे।
जागरण गीत कविता की व्याख्या॥ Jagran Geet Kavita Ka Bhavarth
1. अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे,
गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूँ ।
अतल अस्ताचल तुम्हें जाने न दूँगा,
अरुण उदयाचल सजाने आ रहा हूँ ।
शब्दार्थ :
- अतल – अथाह, बहुत गहरा
- अरुण – लाल
- उदयाचल – पूर्व दिशा में स्थित वह पर्वत जहाँ से सूर्य उदित होता है।
- आस्ताचल – पश्चिम का कल्पित पर्वत जिसके पीछे सूर्य का अस्त होना माना जाता है, पश्चिमाचल पर्वत।
संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘जागरण गीत’ कविता से लिया गया हैं। इसके कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी हैं।
प्रसंग – इस कविता में कवि ने लोगों को जगाने का प्रयास किया है। कवि लोगों में साहस, कर्म तथा आशावादी भावना का विकास करना चाहता है।
व्याख्या –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि भारतवासियों को जागृति और कर्मशीलता का संदेश दे रहा है। वह उन्हें संबोधित करते हुए कहता है कि अब समय आ गया है जब वे आलस्य, निष्क्रियता और अकर्मण्यता की नींद को त्याग दें। कवि चाहता है कि भारतीय अब अपने कर्त्तव्य मार्ग पर अग्रसर हों और अपने देश के पुनरुत्थान के लिए कार्य करें।
कवि का संकल्प है कि अब वह भारतवासियों को अंधकार या अस्ताचल की ओर नहीं जाने देगा, बल्कि वह उन्हें उस दिशा की ओर ले जाएगा जहाँ से बाल रवि (सूर्य) उदित होता है, अर्थात् नवजागरण और प्रगति के प्रकाश की ओर। इस प्रकार कवि ने इस अंश में राष्ट्रीय चेतना, उत्साह और नवप्रभात की भावना का सुंदर चित्रण किया है।
2. कल्पना में आज तक उड़ते रहे तुम,
साधना से सिहरकर मुड़ते रहे तुम ।
अब तुम्हें आकाश में उड़ने न दूँगा,
आज धरती पर बसाने आ रहा हूँ।
शब्दार्थ :
- कल्पना – भावना, अनुमान
- साधना – किसी कार्य को सिद्ध करना
- धरती – पृथ्वी
- सिहर कर – डरकर
संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘जागरण गीत’ कविता से लिया गया हैं। इसके कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी हैं।
प्रसंग –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने लोगों को कल्पना की दुनिया से निकलकर कर्म और यथार्थ के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। उन्होंने बताया कि हमें स्वप्नों में नहीं, बल्कि कर्म, साधना और वास्तविक प्रयासों से जीवन को सफल बनाना चाहिए।
व्याख्या –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि लोगों को कर्त्तव्यनिष्ठ, कर्मशील और प्रबुद्ध बनने की प्रेरणा देता है। कवि का कहना है कि अब तक लोग केवल कल्पना और भावनाओं की दुनिया में जीते रहे — वे हवाई महल बनाते रहे, सपनों में खोए रहे और कार्य व साधना से डरकर पीछे हटते रहे।
लेकिन अब कवि उन्हें इस कोरी कल्पना से बाहर निकालना चाहता है। वह उन्हें आकाश में उड़ने नहीं देगा, अर्थात् अव्यावहारिक सोच में उलझने नहीं देगा। कवि का उद्देश्य उन्हें पृथ्वी पर बसाना है, यानी वास्तविकता, कर्म और सच्चे प्रयत्नों के मार्ग पर लाना है।
इस प्रकार इस अंश में कवि ने लोगों को आत्मचेतना, कर्म और यथार्थ जीवन की ओर अग्रसर होने का संदेश दिया है।
3. सुख नहीं यह, नींद में सपने सँजोना,
दुख नहीं यह, शीश पर गुरु भार ढोना ।
शूल तुम जिसको समझते थे अभी तक,
फूल में उसको बनाने आ रहा हूँ ।
शब्दार्थ :
- शूल – काँटा; कविता में शूल दु:ख का तथा फूल सुख का प्रतीक है।
- सपने सजाना – बड़ी-बड़ी कल्पना करना।
- गुरु भार – बड़ा उत्तरदायित्व।
- शीश – मस्तक
संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘जागरण गीत’ कविता से लिया गया हैं। इसके कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी हैं।
प्रसंग –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने लोगों को यह संदेश दिया है कि केवल कल्पनाओं से नहीं, बल्कि कर्त्तव्य और कर्म से ही सच्चा सुख मिलता है। उन्होंने बताया कि यदि हम साहसपूर्वक कठिनाइयों को स्वीकार करें, तो वही दुःख हमारे जीवन का आनंद बन सकते हैं।
व्याख्या –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि लोगों को सावधान और जागरूक कर रहा है। वह कहता है कि केवल बड़ी-बड़ी कल्पनाएँ करने या सपने देखने से सुख प्राप्त नहीं हो सकता। वास्तविक सुख तो कर्त्तव्य पालन और उत्तरदायित्व निभाने में ही है।
कवि का कहना है कि जिसे लोग अब तक काँटा यानी दुःख और कठिनाई समझते आए हैं, वास्तव में वही जीवन का फूल यानी सच्चा सुख और आनंद बन सकता है — यदि हम उसे साहस और कर्म से स्वीकार करें।
इस प्रकार कवि का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि सुख-दुःख दृष्टिकोण पर निर्भर करते हैं; अगर हम कर्त्तव्य और कर्म को अपनाएँ, तो हर दुःख भी आनंद का रूप ले सकता है।
4. देखकर मँझधार को घबरा न जाना,
हाथ ले पतवार को घबरा न जाना।
मैं किनारे पर तुम्हें थकने न दूँगा,
पार मैं तुमको लगाने आ रहा हूँ ।
शब्दार्थ :
- मंझधार – नदी के बीच की धारा
- किनारे – तट
- पतवार – पार उतारने का साधन
संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘जागरण गीत’ कविता से लिया गया हैं। इसके कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी हैं।
प्रसंग –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने जीवन में साहस, धैर्य और परिश्रम का संदेश दिया है। उन्होंने बताया कि कठिनाइयों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि धैर्यपूर्वक प्रयास करते रहना चाहिए, क्योंकि निरंतर प्रयत्न करने वाला व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करता है।
व्याख्या –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि लोगों को उत्साह, धैर्य और साहस का संदेश दे रहा है। वह कहता है कि जीवन रूपी नदी में यदि तेज़ धाराएँ या कठिन परिस्थितियाँ सामने आएँ, तो उनसे घबराना नहीं चाहिए।
कवि का कहना है कि हाथों में पतवार (परिश्रम और संकल्प) लेकर धैर्य बनाए रखना चाहिए, क्योंकि जो व्यक्ति धैर्य नहीं खोता, वही अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। कवि स्वयं यह आश्वासन देता है कि वह तट पर खड़े होकर किसी को थकने या हार मानने नहीं देगा, बल्कि उन्हें सफलता के किनारे तक पहुँचाने में सहायता करेगा।
तात्पर्य यह है कि मनुष्य को जीवन की कठिनाइयों का साहस, धैर्य और परिश्रम के साथ सामना करना चाहिए — तभी वह अपने जीवन-संघर्ष में विजयी हो सकता है।
5. तोड़ दो मन में कसी सब श्रृंखलाएँ,
तोड़ दो मन में बसी संकीर्णताएँ।
बिन्दु बनकर मैं तुम्हें ढलने न दूँगा,
सिंधु बन तुमको उठाने आ रहा हूँ।
शब्दार्थ :
- श्रृंखलाएँ – बंधन, जंजीर, कड़ियाँ
- संकीर्णता – कुद्रता, ओछापन, तंगदिली
संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘जागरण गीत’ कविता से लिया गया हैं। इसके कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी हैं।
प्रसंग –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने लोगों को संकीर्णताओं से ऊपर उठकर उदार, विशाल और मानवतावादी बनने का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि हमें जाति-पाँति और भेदभाव के बंधनों को तोड़कर सागर के समान विशाल हृदय वाला बनना चाहिए।
व्याख्या –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि लोगों को उदार, विशाल हृदय और महान बनने की प्रेरणा दे रहा है। कवि का कहना है कि समाज में व्याप्त जाति-पाँति, ऊँच-नीच, छुआछूत, धर्म-संप्रदाय जैसी संकीर्ण भावनाएँ मनुष्य को बाँधकर रखती हैं और उसकी मानवता को सीमित कर देती हैं।
कवि चाहता है कि लोग इन रूढ़ियों, अंधविश्वासों और कुप्रथाओं के बंधनों को तोड़ें और अपने विचारों को सागर की भाँति विशाल बनाएं। वह कहता है कि मैं तुम्हें बूँद के समान संकीर्णता में नहीं रहने दूँगा, बल्कि तुम्हें सागर के समान उदार, विशाल और व्यापक हृदय वाला बनाऊँगा।
तात्पर्य यह है कि कवि समाज में मानव-एकता, समानता और उदारता का भाव जाग्रत करना चाहता है ताकि लोग छोटे-छोटे भेदभावों से ऊपर उठकर सच्चे अर्थों में मानवता के मार्ग पर अग्रसर हो सकें।
6 तुम उठो, धरत्ती उठे, नभ शिर उठाए,
तुम चलो गति में नई गति झनझनाए.
विपथ होकर मैं तुम्हें मुड़ने न दूँगा,
प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ ।
शब्दार्थ :
- धरती – पृथ्वी
- नभ – आकाश
- गति – चाल, वेग
- विपथ – गलत मार्ग, भटकाव
- प्रगति – उन्नति, आगे बढ़ना
संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘जागरण गीत’ कविता से लिया गया हैं। इसके कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी हैं।
प्रसंग –
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने मानव को निरंतर उठने, जागने और प्रगति करने की प्रेरणा दी है। उन्होंने बताया कि मनुष्य की उन्नति से ही विश्व की उन्नति संभव है, इसलिए हमें कर्मशील, दृढ़ और सतत आगे बढ़ते रहना चाहिए।
व्याख्या –
कवि मानव को उठने, जागने और निरंतर प्रगति करने की प्रेरणा दे रहा है। कवि का कहना है कि जब तुम उठोगे और उन्नति करोगे, तो समूचा विश्व भी उठेगा और आगे बढ़ेगा। मनुष्य की उन्नति का सीधा संबंध धरती और संपूर्ण सृष्टि की उन्नति से है।
जब मनुष्य गतिशील और कर्मशील रहता है, तभी जीवन में नई ऊर्जा और प्रगति का प्रवाह होता है। मानव की सक्रियता से ही प्रगति का मार्ग खुलता है। इसलिए कवि चेतावनी देता है कि तुम कभी भ्रष्ट मत होना और न ही रुकना।
कवि स्वयं को एक प्रेरक के रूप में प्रस्तुत करता है जो मनुष्य को प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए आया है। वह मानव से कहता है कि “हे मानव! तुम निरंतर आगे बढ़ते रहो और अपने कर्त्तव्य मार्ग पर दृढ़ता से चलते जाओ।”
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर – सही विकल्प चुनकर उत्तर दीजिए :
क) ‘जागरण गीत’ कविता के कवि हैं :
(क) माखन लाल चतुर्वेदी
(ख) माहेश्वरी प्रसाद द्विवेदी
(ग) सोहनलाल द्विवेदी
(घ) हरिकृष्ण प्रेमी
उत्तर : (ग) सोहनलाल द्विवेदी
ख) कवि इस कविता के द्वारा कैसे लोगों को जगाने की बात कर रहा है :
(क) वास्तविक जीने वाले को
(ख) कल्पनात्मक जीवन जीने वालों को
(ग) कर्मशील जीवन वाले को
(घ) निराश जीवन वाले को
उत्तर : (ख) कल्पनात्मक जीवन जीने वालों को
ग) ‘जागरण गीत’ कविता का कवि लोगों को कहाँ नहीं जाने देगा ?
(क) उदयाचल
(ख) अस्ताचल
(ग) विंध्याचल
(घ) अरूणांचल
उत्तर : (ख) अस्ताचल
लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर
क) ‘उदयाचल’ और ‘अस्ताचल’ शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर :
‘उदयाचल’ का अर्थ है — पूर्व दिशा में स्थित वह काल्पनिक पर्वत, जहाँ से सूर्य के उदय होने की कल्पना की जाती है। यह जीवन में आरंभ, जागरण और प्रगति का प्रतीक है।
‘अस्ताचल’ का अर्थ है — पश्चिम दिशा का वह कल्पित पर्वत, जिसके पीछे सूर्य के अस्त होने की कल्पना की जाती है। यह अंधकार, पतन और निष्क्रियता का प्रतीक है।
ख) ‘विपथ’ होने का आशय क्या है?
उत्तर :
‘विपथ’ होने का आशय उन लोगों से है जो अज्ञान, आलस्य या अकर्मण्यता के कारण सच्चे मार्ग से भटक जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने लक्ष्य पथ को छोड़कर गलत दिशा में चल पड़ते हैं, अर्थात् वे कर्त्तव्य मार्ग से विमुख हो जाते हैं।
ग) ‘कल्पना में उड़ने’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
‘कल्पना में उड़ने’ से तात्पर्य है — मन में ऊँची-ऊँची कल्पनाएँ करना, हवाई महल बनाना, और केवल सपनों में खोए रहना। ऐसे लोग कर्मठ बनकर कार्य करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि बड़ी-बड़ी बातें ही करते रहते हैं। कवि ऐसे लोगों को वास्तविकता की भूमि पर उतरकर कर्मशील बनने की प्रेरणा देता है।
घ) मँझधार में कवि किसको और कैसे पार लगाएगा?
उत्तर :
जो लोग जीवन की मँझधार (कठिन परिस्थितियों) को देखकर घबरा जाते हैं, कवि उन्हें पार लगाना चाहता है। कवि उन्हें सहारा देते हुए कहता है कि पतवार लेकर धैर्य रखें, घबराएँ नहीं। वह उन्हें तट पर थकने नहीं देगा और साहस तथा प्रेरणा देकर जीवन की कठिनाइयों से पार लगाने की चेष्टा करेगा।
बोधमूलक प्रश्नोत्तर
(क) प्रस्तुत कविता में कवि किसे जगा रहा है तथा उन्हें क्या हिदायतें दे रहा है ?
उत्तर :
प्रस्तुत कविता में कवि उन लोगों को जगा रहा है जो वास्तविक जीवन से दूर होकर कल्पनाओं की दुनिया में जीते हैं। कवि उन्हें हिदायत देता है कि अब वे कल्पना करना छोड़कर वास्तविक जीवन जीने का प्रयास करें। उन्हें चाहिए कि वे अपने को पतन की ओर नहीं, बल्कि प्रगति की ओर ले जाएँ। प्रयत्न करने से पीछे न हटें, आकाश में उड़ने के बजाय धरती पर कदम जमाएँ। वे कर्मठ और कर्त्तव्यपरायण बनें तथा अज्ञान और आलस्य की नींद छोड़कर सजग और सावधान रहें।
(ख) मानव मन की किन संकीर्णताओं का वर्णन पाठ में हुआ है? उनका वर्णन करें।
उत्तर :
कवि ने मानव मन की अनेक संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है। आज लोगों के मन में जाति, धर्म, संप्रदाय, अमीरी-गरीबी के भेदभाव जैसी संकीर्णताएँ व्याप्त हैं। मनुष्य के भीतर हीन भावना घर कर गई है। उसके मन को सामाजिक बंधनों, रूढ़ियों और अंधविश्वासों ने जकड़ रखा है। जब तक मनुष्य के भीतर साहस और आत्मबल का संचार नहीं होगा, तब तक वह प्रगति के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता।
(ग) कवि लोगों को क्या करने और क्या न करने का संदेश दे रहा है?
उत्तर :
कवि लोगों को यह संदेश दे रहा है कि हमें अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग और सतर्क रहना चाहिए। केवल कल्पनाओं और सपनों में खोए रहने के बजाय वास्तविक जीवन में कर्म करना चाहिए। धरती पर रहकर सच्चा जीवन जीना ही श्रेष्ठ है। कठिनाइयों और बाधाओं से डरकर पीछे नहीं हटना चाहिए, क्योंकि सच्चा सुख मेहनत और संघर्ष में ही मिलता है। साथ ही, कवि यह भी कहता है कि हमें संकीर्ण विचारों के बंधन को तोड़कर उदार और मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
(घ) निम्न पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए।
i ) प्रगति के पथ पर बढ़ाने आ रहा हूँ।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति में कवि कहता है कि वह लोगों को प्रगति और उन्नति के मार्ग पर ले जाने के लिए आगे आया है। कवि लोगों के मन में साहस, आत्मबल और कर्मठता का संचार करना चाहता है। वह उन्हें आलस्य, अकर्मण्यता और निराशा को त्यागकर कर्त्तव्यनिष्ठ बनने की प्रेरणा देता है। कवि यह संदेश देता है कि केवल कल्पनाओं में खोए रहने से कुछ नहीं होता, वास्तविक धरातल पर कर्म करना ही सच्ची उन्नति का मार्ग है। इसलिए मनुष्य को हीन भावना से मुक्त होकर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए, तभी वह जीवन में सच्ची प्रगति कर सकेगा।
ii) शूल तुम जिसको समझते थे अभी तक
फूल मैं उसको बनाने आ रहा हूँ।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि लोगों को यह विश्वास दिला रहा है कि वे जिन कठिनाइयों और दुखों को अब तक काँटा (शूल) समझते आए हैं, उन्हें वह अपनी प्रेरणा और परिश्रम से सुखद (फूल) बना देगा। कवि का आशय है कि जीवन की कठिनाइयों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें साहस और कर्म से सुन्दर अवसरों में बदल देना चाहिए। कवि यह भी संदेश देता है कि केवल कल्पनाओं में सुख ढूँढना व्यर्थ है — सच्चा सुख तो जिम्मेदारियों को निभाने और कठिन परिस्थितियों का डटकर सामना करने में है। अतः मनुष्य को साहसपूर्वक कर्म करना चाहिए, तभी वह जीवन के काँटों को फूलों में बदल सकता है।
भाषा और बोध
क) निम्नलिखित शब्दों के अर्थ लिखकर वाक्यों में प्रयोग करो –
प्रगति – उत्थान
वाक्य: कर्मठ बनकर ही मनुष्य जीवन में प्रगति कर सकता है।
अरुण – लाल सूर्य
वाक्य: प्रभात होते ही बाल अरुण उदय हो जाता है।
शूल – काँटा (दुःख)
वाक्य: मनुष्य प्रयत्न कर शूल को फूल बना सकता है।
शृंखला – बंधन
वाक्य: हमें सभी शृंखलाओं को तोड़ देना चाहिए।
पतवार – पार उतारने का साधन
वाक्य: हाथ में पतवार लेकर नाविक थकता नहीं।
(ख) निम्नलिखित शब्दों का विलोम शब्द लिखिए –
आकाश – पाताल
कल्पना – यथार्थ
दुःख – सुख
गुरु – लघु
फूल – शूल
(ग) पाठ से प्र, वि, अ, सम् उपसर्ग लगे शब्दों को चुनकर लिखो –
प्र – प्रगति
वि – विपथ
अ – अतल
सम् – संकीर्णताएँ
घ) पर्यायवाची शब्द लिखिए –
नभ – आकाश, गगन, आसमान
धरती – धरा, पृथ्वी, भू
फूल – पुष्प, सुमन, कुसुम
सिन्धु – सागर, समुद्र, रत्नाकर
‘जागरण गीत’ कविता का सारांश
कवि सोहनलाल द्विवेदी की कविता ‘जागरण गीत’ एक प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक रचना है। इस कविता में कवि ने आलस्य, अकर्मण्यता और निराशा में डूबे हुए मनुष्यों को जगाने, उन्हें कर्मशील, आशावादी और प्रगतिशील बनाने का संदेश दिया है।
कवि लोगों से कहता है कि अब वे गहरी नींद में सोना छोड़ दें। अब जागने और कर्म करने का समय आ गया है। वह उन्हें जगाने और उनके जीवन में नई चेतना भरने आया है। कवि कहता है कि वह उन्हें अंधकारमय अस्ताचल की ओर नहीं जाने देगा, बल्कि अरुणोदय (उषा काल) की तरह नई रोशनी से भर देगा।
दूसरे पद में कवि लोगों से कहता है कि वे केवल कल्पनाओं में उड़ते रहे हैं, लेकिन अब समय है कि वे धरती पर उतरें और वास्तविकता में कुछ करें। वह उन्हें कोरी कल्पना से हटाकर साधना और परिश्रम के मार्ग पर ले जाना चाहता है।
तीसरे पद में कवि यह स्पष्ट करता है कि केवल सपनों में जीना सुख नहीं है और बड़े उत्तरदायित्व उठाना दुख नहीं है। जिसे लोग अब तक काँटा समझते थे, कवि उसे फूल में बदलने आया है, अर्थात कठिनाइयों को भी अवसर में बदलने की प्रेरणा दे रहा है।
चौथे पद में कवि कहता है कि जीवन रूपी नदी की मंझधार में घबराना नहीं चाहिए। धैर्य और साहस से काम लेना चाहिए। वह स्वयं मानव को पार लगाने वाला सहायक बनकर उपस्थित है। कवि यह सिखाता है कि कठिनाइयों का सामना करने से ही सफलता मिलती है।
पाँचवें पद में कवि समाज में व्याप्त संकीर्णता, जाति-पाँति, धर्म, ऊँच-नीच, और अंधविश्वास जैसी मानसिक जंजीरों को तोड़ने का संदेश देता है। वह मनुष्य को बूँद नहीं बल्कि सागर जैसा विशाल और उदार बनने की प्रेरणा देता है।
अंतिम पद में कवि कहता है कि जब मनुष्य उठेगा और आगे बढ़ेगा तो पूरी धरती और आकाश भी उसके साथ गति पाएंगे। कवि मानव को चेतावनी देता है कि वह कभी गलत मार्ग पर न जाए और न ही रुक जाए। कवि स्वयं को एक मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत करता है जो मानव को प्रगति के मार्ग पर बढ़ाने आया है।
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