मैला आँचल उपन्यास का सारांश | फणीश्वरनाथ रेणु

फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल हिंदी साहित्य का एक कालजयी, सशक्त और प्रतिनिधि आंचलिक उपन्यास है। यह उपन्यास केवल एक गाँव की कथा नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता से ठीक पहले और स्वतंत्रता के बाद के ग्रामीण भारत का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दस्तावेज है। रेणु ने इसमें ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, कुरीतियों, संघर्षों, आकांक्षाओं, आशाओं और विडंबनाओं को अत्यंत सजीव और यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया है। आचार्य नलिन विलोचन शर्मा के शब्दों में, गोदान के बाद यह हिंदी का सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। विशेष बात यह है कि मैला आँचल रेणु का पहला उपन्यास है, जिसने उन्हें अपार प्रतिष्ठा दिलाई।
उपन्यास की पृष्ठभूमि बिहार के पूर्णिया जिले का एक पिछड़ा ग्रामीण अंचल है, जिसका केंद्र मेरीगंज नामक गाँव है। मेरीगंज गाँव का इतिहास भी प्रतीकात्मक है। कहा जाता है कि यह स्थान पहले जंगल था, जिसे ‘नवाबी तड़बन्ना’ कहा जाता था। अंग्रेज अधिकारी डब्लू. जी. मार्टिन ने यहाँ अपनी नवविवाहिता पत्नी ‘मेरी’ के नाम पर एक कोठी बनवाई और इस क्षेत्र का नाम ‘मेरीगंज’ रखा। दुर्भाग्यवश, मेरी मलेरिया (काडैया) की चपेट में आकर मर जाती है और मार्टिन मानसिक रूप से विक्षिप्त होकर पागलखाने में दम तोड़ देता है। यह घटना ही गाँव के भविष्य की पीड़ा, बीमारी और अभाव का संकेत बन जाती है।
समय के साथ मेरीगंज एक बड़ा गाँव बन जाता है, जहाँ अनेक जातियाँ और वर्ग रहते हैं—कायस्थ, राजपूत, यादव, ब्राह्मण तथा अन्य पिछड़ी जातियाँ। इन जातियों के बीच आपसी स्वार्थ, ईर्ष्या, दलबंदी और संघर्ष सामान्य बात है। कायस्थों के नेता तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक, राजपूतों में ठाकुर रामकिरपाल सिंह और यादवों में लेखावत यादव प्रमुख व्यक्ति हैं। इन सबके बीच सामाजिक तनाव और सत्ता की होड़ निरंतर चलती रहती है।
उपन्यास का कोई एक केंद्रीय कथानक या नायक नहीं है। यह अनेक पात्रों और घटनाओं का समूह है, जो मिलकर ग्रामीण जीवन की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करता है। फिर भी डॉ. प्रशांत कुमार (या प्रशांत बनर्जी) इस उपन्यास का सबसे प्रमुख चरित्र हैं। वे एक आदर्शवादी, समाजसेवी डॉक्टर हैं, जिन्हें विदेश जाकर अध्ययन और समृद्ध जीवन जीने का अवसर मिलता है, किंतु वे उसे ठुकराकर एक पिछड़े गाँव में सेवा करना चुनते हैं। उनका उद्देश्य मलेरिया, काला-आजार और हैजा जैसी बीमारियों पर शोध करना और ग्रामीणों की सेवा करना है।
गाँव में आकर डॉक्टर प्रशांत को यह एहसास होता है कि यहाँ की असली बीमारी केवल शारीरिक नहीं, बल्कि गरीबी, अज्ञान, अंधविश्वास और सामाजिक शोषण है। ग्रामीण लोग अस्पताल और डॉक्टर से डरते हैं। वे मानते हैं कि डॉक्टर कुओं में दवा डालकर बीमारी फैलाते हैं। फिर भी अस्पताल खुलता है और धीरे-धीरे लोग इलाज के लिए आने लगते हैं।
उपन्यास में कई अन्य महत्वपूर्ण पात्र हैं। बालदेव एक सच्चे गांधीवादी, समाज-सुधारक और कांग्रेस कार्यकर्ता हैं। वे चरखे और अहिंसा में विश्वास रखते हैं तथा गाँव में सुधार लाने का प्रयास करते हैं। बावनदास गांधीजी के आदर्शों का सच्चा अनुयायी है, जो ईमानदारी और सत्य के कारण अंततः व्यवस्था का शिकार हो जाता है। कालीचरण एक क्रांतिकारी समाजवादी युवक है, जो सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसक और उग्र रास्ते अपनाने को भी तैयार है। वासुदेव कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रतिनिधि है।
लक्ष्मी एक अत्यंत मार्मिक स्त्री पात्र है। वह बचपन से ही अनाथ है और मठ में दासी बनकर शोषण का शिकार होती है। इसके बावजूद वह समझदार, व्यवहारकुशल और संवेदनशील है। बालदेव और लक्ष्मी के बीच पवित्र प्रेम विकसित होता है, जो ग्रामीण समाज की मानवीय संवेदना को उजागर करता है। मठाधीश महंत और उसका शिष्य रामदास मठ की धार्मिक आड़ में स्वार्थ और वासना का प्रतीक हैं।
कमला, तहसीलदार विश्वनाथ की किशोरी बेटी है। वह गंभीर बीमारी से ग्रस्त है और उसका इलाज डॉक्टर प्रशांत करते हैं। उपचार के दौरान कमला डॉक्टर से प्रेम करने लगती है और धीरे-धीरे डॉक्टर भी उसके प्रेम में बंध जाता है। यह प्रेम कहानी ग्रामीण समाज की रूढ़ नैतिकता और सामाजिक भय को उजागर करती है।
उपन्यास में स्वतंत्रता आंदोलन और ग्रामीण राजनीति का सशक्त चित्रण है। आजादी से पहले कांग्रेस, समाजवादी और अन्य दल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। उस समय इन दलों का उद्देश्य समाज-सुधार और स्वतंत्रता प्राप्ति होता है। लेकिन आजादी के बाद स्थिति बदल जाती है। सत्ता की राजनीति, भ्रष्टाचार, अवसरवाद और जातिगत समीकरण हावी हो जाते हैं। जमींदारी उन्मूलन, भूमि विवाद और संथाल विद्रोह जैसी घटनाएँ ग्रामीण समाज के गहरे अंतर्विरोधों को सामने लाती हैं। विद्रोह में गरीब संथाल मारे जाते हैं या आजीवन कारावास पाते हैं, जबकि प्रभावशाली लोग बच निकलते हैं।
भारत की स्वतंत्रता गाँव में उत्सव का कारण तो बनती है, लेकिन ग्रामीणों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ अधिकतर नौटंकी, भंडारा, कीर्तन और भोज तक ही सीमित रह जाता है। वास्तविक जीवन में उनकी समस्याएँ जस की तस बनी रहती हैं। महात्मा गांधी की हत्या उपन्यास का एक निर्णायक मोड़ है। इसके साथ ही उस आदर्श राजनीति का अंत हो जाता है, जिसका सपना लोगों ने देखा था।
स्वतंत्रता के बाद ईमानदार और आदर्शवादी लोग हाशिए पर चले जाते हैं। बावनदास की हत्या कर दी जाती है, डॉक्टर प्रशांत को कम्युनिस्ट होने के संदेह में जेल भेज दिया जाता है, और कालीचरण तथा वासुदेव जैसे लोग सत्ता और अपराध के दलदल में फँस जाते हैं। कमला गर्भवती हो जाती है और सामाजिक भय से उसका जीवन नर्क बन जाता है।
अंततः ममता और अन्य लोगों के प्रयास से डॉक्टर प्रशांत जेल से मुक्त होते हैं। वे कमला से विवाह करते हैं और गाँव में ही रहकर सेवा करने का संकल्प लेते हैं। वे कहते हैं कि वे “भारत माता के मैले आँचल तले प्यार की खेती करना चाहते हैं” और कुछ लोगों के जीवन में आशा और मुस्कान लौटाना चाहते हैं।
उपन्यास का अंत आशावादी संकेत के साथ होता है कि युगों से सोई हुई ग्राम-चेतना धीरे-धीरे जाग रही है। तमाम अंधकार, संघर्ष और विडंबनाओं के बावजूद परिवर्तन की संभावना बनी रहती है। इस प्रकार मैला आँचल स्वतंत्रता के बाद के ग्रामीण भारत का यथार्थपूर्ण, करुण और मानवीय महाकाव्य है, जो हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यास परंपरा का शिखर माना जाता है।
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