संगठन कविता का प्रश्न उत्तर क्लास 7 ॥ Sangathan Kavita Ka Prashn Uttar ॥ Sangathan Kavita Ka Question Answer
रामनरेश त्रिपाठी का जीवन परिचय
रामनरेश त्रिपाठी का जन्म सन् 1889 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के कोइरीपुर ग्राम में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ। उनके घर का वातावरण धार्मिक और आध्यात्मिक था, जिससे बाल्यकाल से ही रामनरेश पर अध्यात्म और साहित्य की गहरी छाप पड़ी। प्रारंभिक शिक्षा केवल नवीं कक्षा तक हुई, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से हिन्दी, अंग्रेजी, बँगला, संस्कृत और गुजराती भाषा का गहन अध्ययन किया। उन्होंने अपने जीवन को साहित्य-साधना और ज्ञानार्जन के लिए समर्पित कर दिया। उनकी प्रतिभा और परिश्रम ने उन्हें द्विवेदी युग के प्रभाव से स्वतंत्र होकर अपनी मौलिक शैली विकसित करने में मदद की। सन् 1962 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका साहित्य आज भी प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
त्रिपाठीजी का व्यक्तित्व मननशील, विद्वान और परिश्रमी था। वे स्वच्छन्दतावादी कवि थे और लोकगीतों के पहले संकलक भी माने जाते हैं। उन्होंने काव्य, कहानी, नाटक, निबन्ध, आलोचना और लोक-साहित्य जैसे कई क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य किया। उनके साहित्य में आदर्शवाद, राष्ट्र-प्रेम और मानव-सेवा की भावना स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। त्रिपाठीजी ने साहित्य में नवीन आदर्श और नवयुग की झलक दी। उनकी रचनाएँ ‘पथिक’ और ‘मिलन’ खण्डकाव्य अत्यंत लोकप्रिय हुए। इसके अलावा उनकी कविताओं में भारत की प्राकृतिक सुंदरता और पवित्र प्रेम की अनुभूतियाँ भी बखूबी झलकती हैं।
प्रकृति-वर्णन के क्षेत्र में त्रिपाठीजी का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने प्रकृति को अपने काव्य में आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में प्रस्तुत किया। उनके द्वारा वर्णित दृश्य स्वयं उनके अनुभव से जुड़े हुए थे, जिससे कविताओं में प्रामाणिकता और जीवंतता बनी रहती है। भाषा की दृष्टि से त्रिपाठीजी की खड़ीबोली शैली में माधुर्य और ओज दोनों हैं। उनकी शैली सरल, प्रवाहपूर्ण और सरस है, जिसमें वर्णनात्मक और उपदेशात्मक दोनों प्रकार के रूप देखने को मिलते हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘पथिक’, ‘मिलन’, ‘स्वप्न’, ‘मानसी’, ‘कविता-कौमुदी’, ‘ग्राम्य गीत’ और आलोचनात्मक कृति ‘गोस्वामी तुलसीदास और उनकी कविता’ शामिल हैं, जो आज भी हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
संगठन कविता की व्याख्या ॥ संगठन कविता का भावार्थ
1. भगवन् रहे निरंतर दृढ़ संगठन हमारा।
छूटे स्वदेश की ही सेवा में तन हमारा।।
बल, बुद्धि और विद्या धन के अनेक साधन।
कर प्राप्त हम करेंगे निज देश को समर्पण।।
वह शक्ति दो कि भगवन् निभ जाय प्रण हमारा।। छूटे।।
शब्दार्थ :
- निरंतर – लगातार, बिना रुकावट के
- दृढ़ – मजबूत, अडिग
- निज – अपना, व्यक्तिगत
- स्वदेश – अपना देश, मातृभूमि
- समर्पण – अर्पण करना, बलिदान देना
- निभ – निर्वाह होना, पूरा करना
- प्रण – अटल निश्चय, प्रतिज्ञा
- संगठन – बिखरी हुई शक्तियों या लोगों का एकत्रीकरण, एक साथ मिलना
सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ ‘संगठन’ से ली गई हैं। इसके कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं।
प्रसंग :
इन पंक्तियों में कवि ने यह व्यक्त किया है कि वह देश की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं।
व्याख्या :
कवि ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे देश की बिखरी हुई शक्तियाँ एकजुट हों और लोगों का संगठन हमेशा मजबूत बना रहे। वे चाहते हैं कि अपने प्यारे देश की सेवा करते हुए ही हमारा जीवन समाप्त हो।
कवि कहते हैं कि शक्ति, बुद्धि, विद्या और धन सभी साधनों को प्राप्त कर हम अपने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दें। उनका कहना है कि देश की सेवा करना और अपने देश के लिए बलिदान देना ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।
वे प्रभु से यह भी प्रार्थना करते हैं कि हमें ऐसी शक्ति दें जिससे हम अपनी प्रतिज्ञा और बलिदान-भावना पूरी तरह निभा सकें। केवल देश की सेवा में ही हम अपना जीवन समर्पित कर दें।
2. हममें विवेक जागे, हम धर्म को न छोड़ें,
बन्धन कुरीतियों के हम एक-एक तोड़ें।
व्रत ब्रह्मचर्य कम से कम बीस वर्ष पालें,
मन और देह दोनों की शक्तियाँ कमा लें।
निर्बल न हों कभी हम, कि न हो पतन हमारा।। छूटे।।
शब्दार्थ :
- विवेक – बुद्धि, भले-बुरे का ज्ञान
- व्रत – पवित्र संकल्प, दृढ़ निश्चय
- बन्धन – प्रतिबंध, जो रोकता या बांधता है
- निर्बल – कमजोर, शक्ति-हीन
- कुरीति – बुराई, गलत प्रथा या आदत
- पतन – ह्रास, विनाश, अधोगति
सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ ‘संगठन’ से ली गई हैं। इसके कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं।
प्रसंग :
कवि चाहते हैं कि हम सद्बुद्धि प्राप्त करें, अपने धर्म का पालन करें और समाज की बुराइयाँ दूर करें। ब्रह्मचर्य से तन-मन मजबूत होकर हमारा और देश का उत्थान सुनिश्चित होगा।
व्याख्या :
प्रस्तुत अवतरण में कवि ने यह इच्छा व्यक्त की है कि हमें सद्बुद्धि मिले और हम मानसिक तथा शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनें। कवि का कहना है कि भारतवासियों में सद्बुद्धि जाग्रत हो और वे सत्य और असत्य का ज्ञान प्राप्त करें।
वे चाहते हैं कि हम अपने धर्म का त्याग न करें और समाज में फैली बुराइयों को खत्म करें। इसके लिए कम से कम बीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य का दृढ़ पालन हमारे मन और शरीर को शक्ति संपन्न बनाता है। यदि तन-मन की शक्ति बनी रहेगी, तो हम कभी भी कमजोर नहीं होंगे और हमारा विनाश नहीं होगा। इससे हमारे समाज और देश का सदैव उत्थान और प्रगति होती रहेगी।
3. मरना अगर पड़े तो मर जायें हम खुशी से,
निज देश के लिए पर छूटे लगन न जी से।
पर संकटों में चाहे बन जायें हम भिखारी,
सिर पर मुसीबतें ही आ जायें क्यों न सारी।
हिम्मत कभी न हारें, विचले न मन हमारा ।। छूटे।।
शब्दार्थ:
- लगन – लगाव, प्रेम, किसी काम में मन लगाना
- संकट – कठिनाइयाँ, परेशानी की स्थिति
- मुसीबत – विपत्ति, तकलीफ, कठिनाई
- हिम्मत – साहस, धैर्य और ताकत
- विचले – विचलित होना, परेशान या अस्थिर होना
- जी – मन, आत्मा या इच्छा
सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ ‘संगठन’ से ली गई हैं। इसके कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं।
प्रसंग :
कवि ने इस पद में देशभक्ति और अटूट संकल्प की भावना प्रकट की है। वे कहते हैं कि चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, हमें देशसेवा में अडिग और साहसी बने रहना चाहिए।
व्याख्या :
प्रस्तुत पद में कवि ने देशभक्ति और दृढ़ संकल्प की भावना को व्यक्त किया है। कवि का कहना है कि यदि अपने देश के लिए मरना भी पड़े, तो हमें खुशी-खुशी अपने प्राणों की आहुति दे देनी चाहिए। देश के प्रति हमारा प्रेम और लगन कभी भी हमारे मन से नहीं छूटनी चाहिए।
कवि आगे कहते हैं कि अगर देश की सेवा करते हुए हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़े, या हम भिखारी जैसी अवस्था में भी पहुँच जाएँ, तब भी हमें साहस नहीं खोना चाहिए। चाहे हमारे ऊपर कितनी भी मुसीबतें क्यों न आ जाएँ, हमें अपने मन को दृढ़ और शांत रखना चाहिए।
4. सुन वीरता हमारी काँप जाएँ दुष्ट सारे,
कोई न न्याय छोड़े आतंक से हमारे।
जब तक रहे फड़कती नस एक भी बदन में,
हो रक्त बूँदभर भी जब तक हमारे तन में।
छीने न हमसे कोई प्यारा वतन हमारा। छछूटे।।
शब्दार्थ :
- आतंक – रोब, दबदबा, भय
- नस – रक्तवाहिनी, नाड़ी
- बदन – शरीर
- वतन – जन्मभूमि, स्वदेश
- फड़कती – हिलती-डुलती
- दुष्ट – खल, नीच
सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ ‘संगठन’ से ली गई हैं। इसके कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं।
प्रसंग :
कवि ने भारतवासियों की वीरता और शौर्य की प्रशंसा करते हुए कहा है कि उनकी शक्ति से दुष्टजन भयभीत हों। वे कहते हैं कि जब तक हमारे भीतर प्राण और रक्त की एक बूँद भी शेष है, तब तक कोई भी भारत को हमसे छीन नहीं सकता।
व्याख्या :
प्रस्तुत अवतरण में कवि ने स्पष्ट किया है कि भारतीयों की वीरता और साहस से सभी दुष्ट लोग भयभीत हो जाएँ। कवि चाहता है कि भारतवासियों के शौर्य और पराक्रम की गूंज सुनकर दुष्टजन काँप उठें। हमारे प्रभाव और सामर्थ्य को देखकर कोई भी व्यक्ति अन्याय का मार्ग न अपनाए। कवि का कहना है कि जब तक हमारे शरीर में एक भी नस फड़क रही है, जब तक रक्त की एक बूँद और प्राण शेष हैं, तब तक कोई भी शक्ति हमारी मातृभूमि भारत को हमसे छीन नहीं सकती। देश की रक्षा करना और उसके लिए प्राणों की आहुति देना हर भारतवासी का सबसे पवित्र कर्तव्य है।
5. वह शक्ति दो कि जग को अपना बना सकें हम,
वह शक्ति दो कि तुमको फिर से बुला सकें हम।
सुख में तुम्हें न भूलें, दु:ख में न हार मानें,
कर्त्तव्य से न चूकें, तुम को परे न जानें।
गाएँ सुयश खुशी से जग में सुजन तुम्हारा। ।छूटे।।
शब्दार्थ :
- जग – संसार
- हार – पराजय
- सुयश – सुन्दर कीर्ति, अच्छा नाम
- चूकें – सुअवसर को खो देना, भूल करना
- परे – पराया, अलग
- सुजन – भले लोग, सज्जन व्यक्ति
सन्दर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ ‘संगठन’ से ली गई हैं। इसके कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं।
प्रसंग :
कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे ऐसी शक्ति और सद्बुद्धि मिले जिससे वह सदैव कर्त्तव्य मार्ग पर अडिग रह सके। वह चाहता है कि भारत की कीर्ति और गौरव समस्त संसार में गूँज उठे और सब लोग उसका गुणगान करें।
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे ऐसी शक्ति प्रदान करें जिससे वह अपने कर्त्तव्य मार्ग पर सदैव अडिग रह सके और प्रभु को कभी न भूले। कवि चाहता है कि उसे ऐसी दिव्य शक्ति मिले जिससे वह समस्त संसार को अपना हितैषी बना सके और प्रभु को पुनः भारत की पवित्र भूमि पर बुला सके। वह प्रार्थना करता है कि सुख के समय में वह ईश्वर को न भूले और दुःख या संकट के समय कभी निराश या पराजित न हो। कवि यह भी चाहता है कि उसके मन में कभी हीन भावना न आए और वह सत्कर्त्तव्य के सुअवसर को व्यर्थ न जाने दे। वह सदा कर्त्तव्य के मार्ग पर दृढ़ बना रहे, प्रभु को अपना मानकर उनकी शरण में रहे। कवि की कामना है कि सारे संसार के लोग आनंदपूर्वक भारतीयों की कीर्ति और गौरव का गुणगान करें। हे प्रभु, ऐसी शक्ति प्रदान कीजिए।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
क ) कवि किसकी सेवा करने की कामना करता है?
(क) माता-पिता की
(ख) गुरुजनों की
(ग) स्वदेश की
(घ) दुश्मनों की
उत्तर :
(ग) स्वदेश की।
ख) कवि बीस वर्षों तक किस व्रत का पालन करना चाहता है?
(क) बृहस्पति व्रत
(ख) ब्रह्मचर्य व्रत
(ग) वाणप्रस्थ व्रत
(घ) गृहस्थ व्रत
उत्तर :
(ख) ब्रह्मचर्य व्रत।
ग) हमारी वीरता किसके लिए भय का कारण बने ?
(क) दोस्त के लिए
(ख) दुश्मनों के लिए
(ग) अपनों के लिए
(घ) भिखारी के लिए
उत्तर :
(ख) दुश्मनों के लिए।
घ) कवि किस बंधन को तोड़ना चाहता है?
(क) पारिवारिक
(ख) सामाजिक
(ग) कुरीति
(घ) मेल-जोल
उत्तर :
(ग) कुरीति
लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर
क) कवि ईश्वर से क्या प्रार्थना करता है?
उत्तर :
कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि हमें ऐसी शक्ति और प्रेरणा दें जिससे हम सदैव अपने देश की सेवा करें और मानवता की भलाई में लगे रहें। ईश्वर हमें सच्चा देशभक्त बनने का आशीर्वाद प्रदान करें।
ख) इस कविता के माध्यम से कवि ने हमें क्या सन्देश दिया है?
उत्तर :
इस कविता के माध्यम से कवि ने हमें यह सन्देश दिया है कि हमें अपने कर्तव्य के मार्ग से कभी नहीं चूकना चाहिए। हमें सदैव अपने देश की रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में कमजोर या निराश नहीं होना चाहिए। सच्चा देशभक्त वही है जो संकट के समय भी साहस और दृढ़ता बनाए रखे।
ग) कवि किन साधनों को प्राप्त करने की कामना करता है?
उत्तर :
कवि बल, बुद्धि, विद्या और धन जैसे अनेक साधनों को प्राप्त करने की कामना करता है, ताकि इनका उपयोग वह देश की सेवा और मानव कल्याण के कार्यों में कर सके।
घ) किन परिस्थितियों में कवि हिम्मत न हारने की सलाह हमें दे रहा है?
उत्तर :
कवि हमें यह सलाह दे रहा है कि जब हम संकटों और मुसीबतों से घिर जाएँ, जब जीवन में कठिनाइयाँ आ जाएँ या हम दरिद्र बन जाएँ, तब भी हमें कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी हमें साहस और धैर्य बनाए रखना चाहिए।
बोधमूलक प्रश्नोत्तर
(क) संगठन कविता का मूल सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
प्रस्तुत कविता में कवि ने ईश्वर से प्रार्थना की है कि हमें ऐसी शक्ति और शान्ति प्रदान करें जिससे हमारा देश सदा संगठित और मजबूत बना रहे। हम अपने देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने की भावना रखें और सदैव सत्य, साहस तथा सदाचार के मार्ग पर चलें। कवि चाहता है कि हम समाज की सभी बुराइयों को दूर करें, किसी भी संकट में हिम्मत न हारें और अपने शौर्य से शत्रुओं को भयभीत कर दें। हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए कि जब तक प्राण रहें, हम अपने स्वदेश की रक्षा करें और पूरे संसार में भारत की कीर्ति फैले।
(ख) कवि मातृभूमि की सेवा कैसे करना चाहता है?
उत्तर :
कवि चाहता है कि वह अपनी मातृभूमि की सेवा में अपना सब कुछ समर्पित कर दे। वह बल, बुद्धि, विद्या और धन जैसे सभी साधनों को देश की भलाई में लगाना चाहता है। कवि का मानना है कि जब तक उसके शरीर में प्राण रहें, वह स्वदेश की रक्षा करता रहे और उसके प्रति सच्चा प्रेम बनाए रखे। कवि देश सेवा को सबसे बड़ी सेवा और देश के लिए प्राण अर्पित करने को सबसे महान बलिदान मानता है।
(ग) कवि निर्बलता एवं पतन से बचने के लिए हमें क्या सलाह देता है?
उत्तर :
कवि हमें यह सलाह देता है कि हम समाज में फैली सभी बुराइयों और कुरीतियों के बंधनों को तोड़ दें। हमें सच्चरित्र जीवन जीना चाहिए और कम से कम बीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करके अपने मन और शरीर को शक्ति-संपन्न बनाना चाहिए। ऐसा करने से हम कभी निर्बल नहीं होंगे और न ही हमारा पतन होगा।
(घ) कवि ईश्वर से शक्ति क्यों माँगता है?
उत्तर :
कवि ईश्वर से शक्ति माँगता है ताकि उसे प्राप्त कर वह पूरे संसार को अपना बना सके और भारत को फिर से महान बना सके। वह चाहता है कि हमें ऐसी शक्ति मिले जिससे हम सुख के समय ईश्वर को न भूलें, दुख के समय हिम्मत न हारें और सदैव अपने कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहें। कवि की इच्छा है कि हमारे अच्छे कर्मों से समस्त संसार में भारत की सुकीर्ति गूंज उठे।
(ङ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर यथा निर्देश दीजिए-
(अ) छीने न कोई हमसे प्यारा वतन हमारा।
i .कवि एवं कविता का नाम लिखिए।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्तियों के कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी हैं। यह पंक्तियाँ उनकी ‘संगठन’ कविता से ली गई हैं।
ii. उक्त अंश में कवि क्या संदेश देता है और क्यों?
उत्तर :
उक्त अंश में कवि हमें यह संदेश देता है कि कठिन परिस्थितियों में भी हमें कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। चाहे संकट, मुसीबत या दरिद्रता क्यों न आ जाए, हमें अपने मन को दृढ़ रखकर देश की सेवा और उसके हित में कार्य करते रहना चाहिए। कवि यह संदेश इसलिए देता है ताकि हम निर्भय, साहसी और सच्चे देशभक्त बनकर अपने राष्ट्र की रक्षा कर सकें।
(ब) गाएँ सुयश खुशी से जग में सुजन हमारा।
i. सुयश और सुजन का अर्थ लिखिए।
उत्तर :
सुयश का अर्थ है – सुंदर, प्रशंसनीय कीर्ति या अच्छा यश।
सुजन का अर्थ है – भले, सज्जन व्यक्ति जो सदा अच्छे कार्य करते हैं।
ii. संसार के लोग हमारा सुयश कैसे गा सकते हैं?
उत्तर :
संसार के लोग हमारा सुयश तभी गा सकते हैं जब हम अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें, देश और समाज की भलाई के लिए कार्य करें, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलें तथा सदैव साहस और दृढ़ता बनाए रखें। हमारे अच्छे कर्मों से ही संसार में हमारी कीर्ति और यश फैल सकता है।
भाषा – बोध
(क) निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग अलग करो —
| शब्द | उपसर्ग + मूल शब्द |
|---|---|
| संगठन | सम् + गठन |
| स्वदेश | स्व + देश |
| निरंतर | नि: + अन्तर |
| कुरीति | कु + रीति |
| सुजन | सु + जन |
(ख) निम्नलिखित शब्दों का पर्यायवाची शब्द लिखिए —
| शब्द | पर्यायवाची शब्द |
|---|---|
| देश | राष्ट्र, जनपद, जन्मभूमि |
| विद्या | ज्ञान, बोध, विद्वता |
| देह | शरीर, तन, बदन |
| जग | संसार, विश्व, दुनिया |
| भिखारी | भिक्षुक, याचक, माँगनेवाला |
(ग) संस्कृत के मूल शब्दों को तत्सम शब्द कहते हैं। पाठ में आए कुछ तत्सम शब्दों को चुनकर लिखो—
उत्तर: स्वदेश, समर्पण, शक्ति, धर्म, न्याय, सुयश।
(घ) निम्नलिखित शब्दों का विलोम शब्द लिखिए —
| शब्द | विलोम शब्द |
|---|---|
| निर्बल | सबल |
| संगठन | विघटन |
| स्वदेश | विदेश |
| पतन | उत्थान |
| भिखारी | दाता / दानी |
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