तुलसीदास की काव्यगत विशेषताएं लिखिए ॥ Tulsidas Ki Kavyagat Visheshta Likhiye
गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय
गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के आकाश के उज्ज्वल नक्षत्र और भक्तिकाल के सगुण रामभक्ति शाखा के महान कवि थे। उनका जन्म संवत 1589 में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ माना जाता है, हालांकि कुछ विद्वान एटा जिले के सोरों को उनका जन्मस्थान मानते हैं। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। बचपन में उनका नाम रामबोला रखा गया था। अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया था, और उनका पालन-पोषण मुनिया नामक दासी ने किया। बचपन से ही तुलसीदास अत्यंत बुद्धिमान, संस्कारवान और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। बाद में उन्हें बाबा नरहरिदास जैसे महान संत गुरु के रूप में प्राप्त हुए, जिन्होंने उन्हें आध्यात्मिकता और रामभक्ति का मार्ग दिखाया। तुलसीदास जी अपने गुरु के प्रति अत्यंत श्रद्धावान थे, जैसा कि उन्होंने लिखा — “बंदौ गुरुपद कंज, कृपा सिंधु नररूप हरि।”
तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली नामक स्त्री से हुआ था, जो दीनबंधु पाठक की पुत्री थीं। वे अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे, लेकिन जब एक बार वे हनुमान मंदिर गए और लौटने पर पाया कि उनकी पत्नी मायके चली गई हैं, तो वे उनसे मिलने के लिए यमुना नदी पार कर पहुँच गए। तब रत्नावली ने उन्हें कहा — “अस्थिचर्ममय देह यह ता पर ऐसी प्रीति, होती जो प्रभु राम में तो न होति भवभीति।” इस एक वाक्य ने तुलसीदास के जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर दिया और भक्ति तथा साधना के मार्ग पर चल पड़े। इसके बाद उन्होंने तीर्थ यात्रा की, अनेक संतों का दर्शन किया और अंततः अयोध्या में निवास किया। अयोध्या में ही उन्हें भगवान श्रीराम के दर्शन हुए और भगवान की प्रेरणा से उन्होंने अवधी भाषा में ‘रामचरितमानस’ की रचना प्रारंभ की।
तुलसीदास जी ने अपने जीवन में अनेक धार्मिक और साहित्यिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं — रामचरितमानस, दोहावली, कवितावली, गीतावली, विनयपत्रिका, जानकीमंगल, पार्वतीमंगल आदि। ‘रामचरितमानस’ उनकी सबसे महान कृति मानी जाती है, जिसमें उन्होंने श्रीराम के जीवन, आदर्श और मर्यादा का भावनात्मक और भक्ति से परिपूर्ण वर्णन किया है। यह ग्रंथ न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने समाज में नैतिकता, सदाचार और भक्ति का संदेश फैलाया। तुलसीदास ने अवधी जैसी जनभाषा में काव्य रचकर उसे आम लोगों तक पहुँचाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची भक्ति और प्रेम से व्यक्ति आत्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।
तुलसीदास जी का जीवन अत्यंत सरल, त्यागमय और भक्ति से परिपूर्ण था। उन्होंने 126 वर्ष तक जीवित रहकर समाज को भक्ति और मानवता का संदेश दिया। उनका निधन संवत 1680 में श्रावण माह कृष्ण तृतीय शनिवार को हुआ। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी अंतिम रचना ‘विनय-पत्रिका’ भगवान श्रीराम के नाम समर्पित की थी, जिस पर स्वयं भगवान ने हस्ताक्षर किए। तुलसीदास जी ने अपने जीवन के माध्यम से यह सिखाया कि ईश्वर भक्ति, सत्य, प्रेम और निष्ठा के मार्ग पर चलने से मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। आज भी उनके दोहे, चौपाइयाँ और उपदेश समाज को प्रेरणा देते हैं और उनका नाम सदा अमर रहेगा।
तुलसीदास की काव्यगत विशेषताएं
1. भक्ति भावना
तुलसीदास के काव्य का मूल तत्व भक्ति है। उनके सम्पूर्ण साहित्य में रामभक्ति की अविरल धारा प्रवाहित होती है। वे राम को केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि अपने आराध्य, स्वामी, मित्र और सखा के रूप में देखते हैं। उनके हृदय में दास्य भाव की भक्ति सर्वाधिक प्रकट होती है — जहाँ कवि स्वयं को प्रभु का दास मानता है और राम को अपने सर्वस्व के रूप में स्वीकार करता है।
तुलसीदास के काव्य में राम का शील, सौंदर्य, शक्ति, मर्यादा और करुणा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। वे कहते हैं कि उनके जीवन का प्रत्येक श्वास केवल श्रीराम के नाम से ही पवित्र होता है। तुलसीदास कभी बालक राम की लीलाओं में तल्लीन हो जाते हैं, तो कभी मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श चरित्र पर निहाल हो उठते हैं —
“अवधेस के बालक चारि सदा, तुलसी मन मंदिर में बिहरै।”
यह पंक्ति तुलसीदास के मन की उस भक्तिभावना को व्यक्त करती है, जिसमें वे अपने हृदय को राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का निवास-स्थान बना लेना चाहते हैं।
वे स्वयं को दीन-हीन मानते हैं और स्वीकार करते हैं कि प्रभु की कृपा के बिना मुक्ति असंभव है। उनके विनम्र भाव इस प्रकार प्रकट होते हैं —
“राम सो बड़ो कौन है, मो से छोटो कौन।
राम सो खरो कौन है, मो से छोटो कौन॥”
उनका मानना है कि सेवक और सेव्य भाव के बिना सच्ची भक्ति संभव नहीं —
“सेवक-सेव्य भाव बिना, भव न तरिए उरगारि।”
तुलसीदास की भक्ति में न तो आडंबर है और न ही दिखावा। यह भक्ति हृदय की गहराई से उत्पन्न निष्काम और निःस्वार्थ भावना है। उनके अनुसार, संसार के सारे सहारे मिथ्या हैं, केवल राम नाम ही सच्चा आधार है —
“एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास॥”
इस प्रकार, तुलसीदास की भक्ति भावना उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि एक दिव्य साधक के रूप में प्रतिष्ठित करती है। उनका सम्पूर्ण काव्य राम-नाम की महिमा, समर्पण और प्रेम का अमर स्तोत्र बन जाता है।
2. राम के सगुण स्वरूप की आराधना
तुलसीदास के काव्य में राम के सगुण स्वरूप की आराधना प्रमुख स्थान रखती है। वे श्रीराम को परम ब्रह्म मानते हैं, जो भक्तों के लिए सगुण और साकार रूप में प्रकट होते हैं। तुलसीदास के राम विष्णु के अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम और धर्म की स्थापना करने वाले हैं। उन्होंने मानव रूप में अवतरित होकर अधर्म का नाश और धर्म की रक्षा की।
तुलसीदास के अनुसार, भगवान राम केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं बल्कि शील, शक्ति और सौंदर्य के अद्भुत संगम हैं। वे भक्तों के रक्षक और दुष्टों के संहारक हैं। तुलसीदास लिखते हैं कि भगवान राम ने इस धरती पर अवतार केवल जनकल्याण के लिए लिया —
“धरम के हेतु जनमंगल के हेतु भूमि,
भारू हरिषे को अवतार लियो नर को।
नीति और प्रीति प्रतिपाल चालि प्रभु भावुः,
लोकवेद राखिवै को पनु रघुवर को॥”
इस पंक्ति में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि राम का अवतार केवल नीति, धर्म और लोकमंगल के लिए हुआ है। वे पृथ्वी पर आदर्श मर्यादा स्थापित करने आए — इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया।
यद्यपि तुलसीदास ने राम के सगुण रूप की ही उपासना की, फिर भी वे निर्गुण निराकार ब्रह्म की सत्ता को नकारते नहीं। उनके लिए निर्गुण और सगुण — दोनों एक ही परम तत्व के दो रूप हैं। वे मानते हैं कि जब वही निर्गुण ब्रह्म भक्तों की कृपा के लिए रूप धारण करता है, तब वह राम कहलाता है।
तुलसीदास के अनुसार, श्रीराम के चरणों में समस्त देवता भी वंदना करते हैं —
“सोई दशरथ सुत भगत हित, कौशलपति भगवान॥”
यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि तुलसीदास के राम केवल अयोध्या के राजा नहीं, बल्कि सृष्टि के पालनकर्ता और भक्तों के कृपालु ईश्वर हैं। इस प्रकार, उनके काव्य में राम के सगुण स्वरूप की आराधना परम भक्ति और श्रद्धा के साथ प्रकट होती है, जो भक्ति युग की सर्वोत्तम विशेषता है।
3. समन्वय की विराट चेष्टा
तुलसीदास का काव्य समन्वय की विराट चेष्टा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने अपने राम भक्ति काव्य में केवल धार्मिक भावनाओं का ही नहीं, बल्कि समाज, दर्शन और जीवन के विविध विरोधी तत्त्वों का भी अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत किया है। तुलसीदास का साहित्य विभाजन नहीं, बल्कि एकता, संतुलन और समरसता का संदेश देता है।
उनके काव्य में ब्राह्मण और शूद्र, शैव और वैष्णव, निर्गुण और सगुण, राजा और रंक, द्वैत और अद्वैत, भोग और त्याग, भाग्य और पुरुषार्थ — सभी के बीच एक अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। वे यह सिद्ध करते हैं कि ईश्वर की भक्ति और मानवता की भावना किसी जाति, संप्रदाय या वर्ग की सीमाओं में नहीं बंधी होती।
निर्गुण और सगुण के बीच संतुलन की व्याख्या करते हुए तुलसीदास लिखते हैं —
“अगुनहि-सगुनहि कछु नांहि भेदा,
गावहिं मुनि पुरान बुध वेदा।
अगुन प्ररूप अलख अज जोई,
भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥”
इन पंक्तियों में कवि ने स्पष्ट किया है कि निर्गुण और सगुण ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। वही निराकार ब्रह्म, भक्तों के प्रेम से सगुण रूप धारण कर लेता है। यही भाव उनके काव्य को व्यापक और उदार बनाता है।
तुलसीदास की भक्ति में भी समन्वय की झलक मिलती है। उन्होंने राम की उपासना के साथ-साथ शिव, गणेश, पार्वती और हनुमान जैसे देवों की वंदना भी की है। वे राम और शिव दोनों को एक ही तत्व का रूप मानते हैं —
“शिव द्रोही मम दास कहावा,
सो नर मोहि सपनेंहुं नहिं भावा॥”
इससे यह स्पष्ट होता है कि तुलसीदास शैव और वैष्णव मत में कोई विरोध नहीं देखते, बल्कि दोनों को एक ही ईश्वर प्रेम की धारा मानते हैं।
सामाजिक दृष्टि से भी उन्होंने जाति और वर्ण की ऊँच-नीच को भक्ति के मार्ग में बाधा नहीं माना। केवट प्रसंग इसका श्रेष्ठ उदाहरण है, जहाँ भगवान राम स्वयं एक शूद्र के प्रेम से अभिभूत हो जाते हैं —
“प्रेम पुलकि केवट कहि नामू,
कीन्ह दूरि ते देख प्रनामू।
राम सखा रिणी बरवास भेंटा,
जनुमहि लूठत सनेह समेटा॥”
इन पंक्तियों में तुलसीदास ने प्रेम और भक्ति को जाति-पांति से ऊपर रखा है। उनके अनुसार, सच्ची भक्ति वही है जो समता, प्रेम और मानवता का संदेश दे।
अंततः, तुलसीदास के काव्य में ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों का अद्भुत संगम मिलता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि जीवन में इन तीनों का संतुलन ही सच्चे धर्म और मोक्ष का मार्ग है। इस प्रकार, तुलसीदास का संपूर्ण साहित्य समन्वय की विराट चेष्टा का दिव्य प्रतीक बन जाता है — जहाँ भक्ति, दर्शन और समाज एक ही सूत्र में बंध जाते हैं।
4. लोककल्याण की भावना
तुलसीदास के राम काव्य का मूल उद्देश्य केवल भक्ति या अध्यात्म नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज के कल्याण की भावना है। उनका काव्य धर्म, नीति और आचरण का ऐसा जीवंत ग्रंथ है जो मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सदाचार, मर्यादा और कर्तव्यनिष्ठा का मार्ग दिखाता है। तुलसीदास ने यह सिद्ध किया कि सच्ची भक्ति वही है जो लोककल्याण के साथ जुड़ी हो।
उनके अनुसार, धर्म और नीति का पालन केवल साधु-संतों का कार्य नहीं, बल्कि हर गृहस्थ, हर नागरिक का दायित्व है। उन्होंने गृहस्थ जीवन को त्याग का प्रतीक नहीं, बल्कि आदर्श जीवन की प्रयोगशाला बताया। राम और सीता का चरित्र इसी भावना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। राम ने राजा होते हुए भी मर्यादा और न्याय को सर्वोच्च माना, जबकि सीता ने स्त्रीत्व और पतिव्रता धर्म की सर्वोच्च मर्यादा स्थापित की।
तुलसीदास के अनुसार, राम का सम्पूर्ण जीवन लोककल्याण की भावना का प्रतीक है। उन्होंने जनहित और सत्य के लिए अपने सुख, वैभव और परिवार तक का त्याग कर दिया। यही कारण है कि तुलसीदास के राम केवल ईश्वर नहीं, बल्कि आदर्श मानव के रूप में पूजे जाते हैं।
कवि लोक जीवन के उत्थान के लिए यह संदेश देते हैं कि व्यक्ति को दूसरों के हित में कार्य करना चाहिए, स्वार्थ और लोभ से दूर रहना चाहिए। इसी भावना को वे इन पंक्तियों में व्यक्त करते हैं —
“लोगन भलो मानव जो, भला होन की आस।
करत गगन को गेंदुआ, सो सठ तुलसीदास॥”
इस दोहे में तुलसीदास समाज के उन लोगों की आलोचना करते हैं जो केवल नाम और दिखावे के लिए भलाई करते हैं। वे सच्चे और निष्काम कर्म की प्रेरणा देते हैं, जो वास्तविक लोककल्याण का मार्ग है।
तुलसीदास केवल कवि या शास्त्रज्ञ ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और लोक शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से समाज में नैतिकता, श्रद्धा और सेवा भाव का संचार किया। साथ ही, उन्होंने लोककला और संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए रामलीला जैसे जनप्रिय आयोजनों की शुरुआत की, जिससे लोगों को आदर्श जीवन के मूल्य प्रत्यक्ष रूप में समझ में आए।
त्योहारों, उत्सवों और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से उन्होंने जनमानस में राम के आदर्शों और लोककल्याण की भावना का प्रसार किया।
इस प्रकार, तुलसीदास का राम काव्य न केवल भक्ति का मार्ग दिखाता है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सत्य, धर्म, नीति और सेवा के माध्यम से लोककल्याण का प्रेरक संदेश भी देता है।
5. लोकधर्म और मर्यादा की स्थापना
तुलसीदास के राम काव्य में लोकधर्म और मर्यादा की स्थापना प्रमुख तत्व के रूप में दिखाई देती है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से यह सिद्ध किया कि धर्म केवल पूजा या साधना का विषय नहीं, बल्कि यह मानव जीवन का आचरण-संहिता है। उनके राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं — अर्थात ऐसे आदर्श पुरुष, जो जीवन के हर क्षेत्र में मर्यादा, नीति और कर्तव्य का पालन करते हैं।
राम अपने जीवन में लोकधर्म का पालन करते हुए यह संदेश देते हैं कि व्यक्ति को अपने स्वार्थ, सुख और निजी इच्छाओं से ऊपर उठकर समाज, परिवार और राष्ट्र के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। जब उन्हें वनवास मिला, तब उन्होंने पिता की आज्ञा और वचन की मर्यादा को सर्वोच्च मानकर राज्य, सुख और वैभव सब त्याग दिया। यही मर्यादा उन्हें आदर्श पुत्र, आदर्श राजा और आदर्श मानव बनाती है।
तुलसीदास ने केवल राम ही नहीं, बल्कि उनके साथ जुड़े सीता, लक्ष्मण, भरत, उर्मिला और दशरथ जैसे सभी पात्रों को भी मर्यादा का प्रतीक बताया है। प्रत्येक चरित्र लोकधर्म का पालन करता है — जैसे दशरथ वचन के प्रति सत्यनिष्ठ हैं, भरत भ्रातृ प्रेम और त्याग के प्रतीक हैं, लक्ष्मण सेवा और समर्पण के उदाहरण हैं, और सीता पतिव्रता मर्यादा की सर्वोच्च प्रतिमा हैं।
‘कवितावली’ में तुलसीदास ने सीता के माध्यम से भारतीय समाज की स्त्री मर्यादा और शील संस्कार का सुंदर चित्रण किया है। जब ग्राम की बुद्धिमती स्त्रियाँ उनसे वन में साथ चलने वाले पुरुषों के बारे में पूछती हैं, तो सीता बिना सीधे नाम लिए केवल संकेतों से उत्तर देती हैं — क्योंकि उस समय पत्नियों का अपने पति का नाम लेना अशोभनीय माना जाता था। इस प्रसंग में तुलसीदास लिखते हैं —
“सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने सयानी जानकी भली।
तिरछे करि नैन, दे सैन, तिन्हें समुझाई कछु, मुसकाई चली॥”
इन पंक्तियों में सीता की लज्जा, शील और मर्यादा का अद्भुत संयम दिखाई देता है। वह कुछ कहे बिना भी अपनी बात का अर्थ समझा देती हैं — यही भारतीय नारी के संस्कार और मर्यादा का प्रतीक है।
तुलसीदास के अनुसार, समाज तभी संतुलित रह सकता है जब उसके सदस्य लोकधर्म और मर्यादा का पालन करें। उनके काव्य में मर्यादा धर्म से ऊपर नहीं, बल्कि धर्म की आत्मा के समान है। राम के आदर्श जीवन के माध्यम से उन्होंने यह सिखाया कि मर्यादा ही मनुष्य को महान बनाती है और समाज को स्थायित्व प्रदान करती है।
इस प्रकार, तुलसीदास का राम काव्य केवल भक्ति का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन-नीति, लोकधर्म और मर्यादा का अमर संदेश है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
6. युगीन समस्याओं का चित्रण
एक महान कवि केवल भावनाओं का चित्रकार नहीं होता, बल्कि अपने युग का सजीव द्रष्टा और समाज का मार्गदर्शक भी होता है। तुलसीदास जैसे लोकहितैषी कवि ने अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का अत्यंत यथार्थ चित्रण किया है। उनके काव्य में न केवल भक्ति और आदर्श हैं, बल्कि युग की करुण सच्चाई भी प्रकट होती है।
तुलसीदास का युग सामाजिक अव्यवस्था, धार्मिक पतन और नैतिक पतन का युग था। उस समय सत्ता अयोग्य और चाटुकार लोगों के हाथों में पहुँच गई थी। राजनीति में भ्रष्टाचार, प्रजा में असंतोष, और जनजीवन में असुरक्षा का माहौल व्याप्त था। धर्म केवल दिखावे तक सीमित रह गया था और आडंबर ने भक्ति की जगह ले ली थी।
तुलसीदास ने इन परिस्थितियों को न केवल समझा, बल्कि उन्हें सुधारने के लिए अपने काव्य को जनजागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब शासन अन्यायी हो और जनता नीतिहीन हो जाए, तब समाज पतन की ओर अग्रसर होता है। वे अपने समय के राजनीतिक शोषण, आर्थिक असमानता और नैतिक अधोगति का चित्रण बड़े साहस से करते हैं।
‘विनय पत्रिका’ में उन्होंने तत्कालीन समाज की दारुण स्थिति का मार्मिक वर्णन किया है —
“खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि,
बनिक को बनिज न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’
बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पै, राम! रावरें कृपा करी।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥”
इन पंक्तियों में तुलसीदास ने अपने युग की त्रासदी को उजागर किया है — किसान भूमि से वंचित हैं, व्यापारी व्यापार से, मजदूर काम से, और भिखारी तक भीख से। जनता भूख, निर्धनता और अन्याय की पीड़ा से कराह रही है। यह चित्रण केवल सामाजिक करुणा नहीं, बल्कि कवि की संवेदनशील चेतना और लोकहित की चिंता का प्रमाण है।
तुलसीदास ने अपने काव्य के माध्यम से यह संदेश दिया कि समाज की उन्नति केवल भक्ति से नहीं, बल्कि न्याय, नीति और धर्म के पालन से संभव है। उन्होंने राम के आदर्श शासन की स्थापना का स्वप्न दिखाया, जहाँ सबका कल्याण हो, सबको न्याय मिले और कोई दुःखी न रहे।
इस प्रकार तुलसीदास का काव्य केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि अपने समय का सामाजिक दस्तावेज़ भी है। उन्होंने भक्ति के माध्यम से समाज सुधार और लोकजागरण का जो कार्य किया, वह उन्हें केवल भक्तकवि ही नहीं, बल्कि महान समाज सुधारक और युगद्रष्टा के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
7. रसयोजना
तुलसीदास के रामचरितमानस में सभी नवरसों (श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयाणक, बीभत्स, अद्भुत और शांत) का अद्भुत समन्वय मिलता है। यद्यपि सभी रसों का प्रयोग हुआ है, परंतु भक्ति भाव की प्रधानता के कारण शांत रस सर्वाधिक प्रभावशाली रूप में विद्यमान है। तुलसीदास ने राम के चरित्र को इतना संतुलित, मर्यादित और आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है कि रसों की विविधता के बावजूद काव्य में गंभीर भक्ति और शांति का भाव प्रबल बना रहता है।
(क) वीर, रौद्र और भयानक रस:
युद्ध वर्णन के प्रसंगों में तुलसीदास ने राम और रावण के युद्ध, हनुमान के पराक्रम, तथा लंका दहन आदि में वीरता का अद्भुत प्रदर्शन किया है। वीर रस के साथ-साथ रौद्र और भयानक रस भी इन वर्णनों में प्रभावशाली बन पड़े हैं।
(ख) श्रृंगार रस:
राम और सीता के संयोग और वियोग प्रसंगों में मर्यादित श्रृंगार रस का सुंदर चित्रण मिलता है। बालकांड में पुष्पवाटिका के दृश्य में राम और सीता का प्रथम मिलन अत्यंत कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत है—
राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परिछांहिं।
यातै सुधि सबै भूलि गई, कर टेकी रहि पल टारती नांहि॥
यहाँ श्रृंगार रस की उपस्थिति होते हुए भी तुलसीदास ने मर्यादा का पूर्ण पालन किया है।
(ग) वात्सल्य रस:
बालकांड में वात्सल्य रस का अत्यंत मोहक चित्रण मिलता है। बालक राम के खेलकूद, बाल सुलभ क्रियाओं और माता कौशल्या के स्नेहिल व्यवहार में वात्सल्य रस झलकता है—
कबहूँ ससि माँगत अरि करै, कबहूँ प्रतिबिंब निहारि डरै।
कबहूँ करताल बजाई कै नाचत, मातु सबै मन मोद भरै॥
(घ) करुण रस:
राम के वनवास, दशरथ-विलाप, सीता-हरण, और लक्ष्मण को शक्ति लगने जैसे प्रसंगों में करुण रस अपने चरम पर पहुँच जाता है। राम के वियोग में उनका यह मर्मस्पर्शी आह्वान देखें—
हे खग, मृग हे, मधुकर स्त्रेनी। तुम देखी सीता मृगनैनी॥
(ङ) शांत रस:
काव्य का मूल आधार भक्ति और मर्यादा होने के कारण शांत रस इसकी आत्मा बन जाता है। राम के आदर्श जीवन, नीति, धर्म और करुणा से युक्त आचरण में शांत रस का स्थायित्व देखा जा सकता है।
8. विभिन्न काव्यरूप
तुलसीदास जी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने रामकाव्य को विविध काव्यरूपों में प्रस्तुत कर हिंदी साहित्य को अत्यंत समृद्ध बनाया। उनके काव्य में प्रबंध काव्य, खंडकाव्य, गीतिकाव्य, मुक्तक काव्य और दृश्यकाव्य—सभी रूपों की झलक मिलती है।
(क) प्रबंध काव्य:
तुलसीदास का महान ग्रंथ रामचरितमानस भारतीय साहित्य का सर्वोत्तम प्रबंध काव्य है। इसमें कथा, पात्र, संवाद, और घटनाओं का ऐसा अद्भुत समन्वय है जो इसे कालजयी कृति बनाता है।
(ख) खंडकाव्य:
जानकीमंगल और पार्वतीमंगल तुलसीदास के प्रसिद्ध खंडकाव्य हैं। इन काव्यों में किसी विशेष प्रसंग या घटना को लेकर काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनकी भाषा और भाव दोनों अत्यंत सरस और भक्तिपूर्ण हैं।
(ग) मुक्तक काव्य:
तुलसीदास जी ने अनेक मुक्तक काव्य भी रचे, जैसे—कवितावली और दोहावली। इनमें प्रत्येक कविता स्वतंत्र होते हुए भी गहन दार्शनिक, धार्मिक और नैतिक संदेश देती है। ये काव्य भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन से परिपूर्ण हैं।
(घ) गीतिकाव्य:
उनकी रचना गीतावली गीतिकाव्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें भगवान राम की महिमा, भक्ति और चरित्र का भावपूर्ण गान किया गया है। इसकी भाषा अत्यंत मधुर और संगीतमयी है, जिससे यह भक्ति-संगीत के रूप में भी प्रसिद्ध हुआ।
(ङ) दृश्यकाव्य:
रामलीला और अन्य धार्मिक मंचन पर आधारित दृश्यकाव्य रूप में भी तुलसीदास की रचनाएँ अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुई हैं। रामचरितमानस के प्रसंगों का मंचन आज भी भारतीय जनजीवन का अभिन्न अंग है।
9. भाषा, छंद व अलंकार
तुलसीदास जी का रामकाव्य भाषागत, छंदगत और अलंकारिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। उन्होंने अपनी रचनाओं में अवधी और ब्रजभाषा — दोनों का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग किया है।
(क) भाषा की विशेषताएँ:
तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में जनभाषा को अपनाया, जिससे उनका साहित्य जन-जन की वाणी बन गया।
- ‘रामचरितमानस’ अवधी भाषा में रचित है और इसे अवधी का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है।
- ‘कवितावली’, ‘गीतावली’ तथा ‘विनयपत्रिका’ ब्रजभाषा में रचित हैं, जिनमें कोमलता, माधुर्य और भावुकता की प्रधानता है।
इसके अलावा तुलसीदास ने लोक में प्रचलित लोकोक्तियों, मुहावरों, तुकों और क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग कर अपनी भाषा को जीवंत बना दिया है। उनकी भाषा में भाव और विचारों की सरलता के साथ-साथ ओज, माधुर्य और प्रवाह का अद्भुत संगम मिलता है।
उदाहरण के रूप में देखें—
“उदित उगयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरषै लोचन भृंग॥”
इस पंक्ति में तुलसीदास ने अत्यंत सहज भाषा में आध्यात्मिक प्रसन्नता का चित्रण किया है।
(ख) छंद प्रयोग:
तुलसीदास छंद रचना में निपुण कवि थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में अनेक छंदों का प्रयोग किया है—
- दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया, कवित्त, हरिगीतिका आदि।
इन छंदों का चयन उन्होंने प्रसंग की भावभूमि के अनुसार किया है। रामचरितमानस में चौपाई और दोहा का अत्यधिक प्रयोग हुआ है, जबकि कवितावली और गीतावली में सवैया और कवित्त का प्रभावी उपयोग दिखाई देता है।
(ग) अलंकार प्रयोग:
तुलसीदास जी की काव्यभाषा अलंकारों की सुंदर सज्जा से शोभित है। उन्होंने अपने काव्य में अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, उत्प्रेक्षा, विभावना, अन्योक्ति और पुनरुक्ति जैसे अलंकारों का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है।
उनकी भाषा में भाव और अर्थ दोनों का सामंजस्य देखने को मिलता है। जैसा कि कहा गया है—
“कविता करके तुलसी न लसै, कविता लसी पा तुलसी की कला।”
10. तुलसीदास का भावपक्ष और कलापक्ष
गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के उन महान कवियों में से हैं, जिनके काव्य में भाव और कला दोनों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उनके काव्य में भक्तिभाव की गहराई, जीवन-दर्शन की व्यापकता और कलात्मक सौंदर्य की परिपूर्णता विद्यमान है। तुलसीदास केवल कवि नहीं, बल्कि भक्त, दार्शनिक और समाज-सुधारक भी थे।
i. भावपक्ष
तुलसीदास जी के काव्य का भावपक्ष अत्यंत व्यापक और गहन है। इसमें भक्ति, करुणा, प्रेम, नीति, मर्यादा और लोककल्याण की भावनाएँ परिपूर्ण रूप से व्यक्त हुई हैं।
(क) भक्ति भाव की प्रधानता
उनके काव्य में राम के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण भाव दिखाई देता है। उन्होंने राम को केवल ईश्वर नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित किया। भक्ति उनके जीवन और काव्य दोनों का प्राण है —
“भज मन राम चरण सुखदाई।
दुख दारिद्य दमन प्रभु गोसाई॥”
(ख) समन्वय की भावना
तुलसीदास ने निर्गुण और सगुण, ज्ञान और कर्म, भक्ति और वैराग्य — सभी में समन्वय स्थापित किया। वे धार्मिक सीमाओं से परे जाकर समरसता का संदेश देते हैं।
(ग) लोकमंगल और मानवता की भावना
उनका काव्य केवल ईश्वर-भक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण का संदेश भी देता है। उन्होंने गृहस्थ जीवन को आदर्श रूप में प्रस्तुत कर लोकधर्म की प्रतिष्ठा की —
“परहित सरिस धर्म नहि भाई। परपीड़ा सम नहि अधमाई॥”
(घ) नीतिपरक दृष्टिकोण
तुलसीदास ने जीवन-मूल्यों की रक्षा और मर्यादा की प्रतिष्ठा पर विशेष बल दिया। उनके पात्र समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं — पुत्र के रूप में राम, पिता के रूप में दशरथ, पत्नी के रूप में सीता, और भाई के रूप में भरत।
ii . कलापक्ष
तुलसीदास के काव्य की कलात्मकता उनके भावों को सजीव रूप में प्रस्तुत करती है। उनकी भाषा, छंद, अलंकार और शैली ने काव्य को अमर बना दिया।
(क) भाषा की उत्कृष्टता
उन्होंने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में काव्य रचना की। उनकी भाषा सरल, सहज, भावपूर्ण और प्रवाहमयी है, जो आम जनता के हृदय तक पहुँचती है।
“उदित उगयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरषै लोचन भृंग॥”
(ख) छंद और अलंकारों का सौंदर्य
तुलसीदास ने दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया, कवित्त जैसे छंदों में भावों की अभिव्यक्ति की है। उनके काव्य में अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, श्लेष, रूपक आदि अलंकारों का अत्यंत सुंदर प्रयोग हुआ है।
(ग) भावानुकूल शैली
उनकी शैली में ओज, माधुर्य और प्रसाद गुण का सुंदर संगम है। विषय और भाव के अनुरूप उनकी भाषा बदलती रहती है — जहाँ भक्ति है वहाँ माधुर्य, जहाँ युद्ध है वहाँ ओज, और जहाँ उपदेश है वहाँ प्रसाद।
(घ) काव्य-संरचना की निपुणता
‘रामचरितमानस’ तुलसीदास की काव्यकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसकी कथा, संवाद, प्रसंग-क्रम और भावानुसार भाषा का चयन – सब कुछ कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट है।
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