अजन्ता की चित्रकला पाठ के प्रश्न उत्तर क्लास 7 ॥ Ajanta Ki Chitrakala Class 7 Question Answer

अजन्ता की चित्रकला पाठ के प्रश्न उत्तर क्लास 7 ॥ Ajanta Ki Chitrakala Class 7 Question Answer

अजन्ता की चित्रकला पाठ के प्रश्न उत्तर क्लास 7 ॥ Ajanta Ki Chitrakala Class 7 Question Answer

वस्तुनिष्ठ प्रश्न:

निम्नलिखित प्रश्नों के सही विकल्प का चयन कीजिए –

प्रश्न 1. अजंता की गुफाएँ किस प्रदेश में हैं ?
(क) महाराष्ट्र
(ख) असम
(ग) गुजरात
(घ) मध्य प्रदेश

उत्तर :
(क) महाराष्ट्र।

प्रश्न 2. अजंता के प्राकृतिक सौन्दर्य का विकास कब से कब तक होता है?
(क) जनवरी से मार्च तक
(ख) अक्टूबर से दिसम्बर तक
(ग) जुलाई से सितम्बर तक
(घ) मार्च से जून तक।

उत्तर :
(ख) अक्टूबर से दिसम्बर तक।

प्रश्न 3. अजंता की कुल कितनी गुफाएँ हैं ?
(क) तीस
(ख) बत्तीस
(ग) उनतीस
(घ) चौबीस

उत्तर :
(ग) उनतीस।

प्रश्न 4. अजंता की सबसे बड़ी स्तूप गुफा है।
(क) सत्रहवीं गुफा
(ख) उन्नीसवीं गुफा
(ग) बारहवीं गुफा
(घ) पाँचवीं गुफा

उत्तर :
(ख) उन्नीसवीं गुफा।

प्रश्न 5. अजंता की सभी गुफाएँ किस काल की हैं?
(क) मौर्य कालीन
(ख) गुप्त कालीन
(ग) मुगल कालीन
(घ) हर्षवर्धन कालीन।

उत्तर :
(ख) गुप्त कालीन।

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रश्न 1. अजंता पहुँचने के लिए किस स्टेशन से किस ग्राम तक जाना पड़ता है?
उत्तर :
अजंता पहुँचने के लिए जलगाँव, औरंगाबाद या पहूर इन तीनों में से किसी एक रेलवे स्टेशन पर उतरना पड़ता है। फिर वहाँ से फरदापुर गाँव तक जाना होता है।

प्रश्न 2. अजंता जाते समय किस नदी को पार करना पड़ता है?
उत्तर :
अजंता जाते समय बघोरा नदी को पार करना पड़ता है।

प्रश्न 3. अजंता की घाटी में किस प्रकार का वन है?
उत्तर :
अजंता की घाटी में चारों ओर हरसिंगार का वन है।

प्रश्न 4. अजंता की किस गुफा में केवल प्रार्थना या उपासना की जाती थी?
उत्तर :
स्तूप गुफा में केवल प्रार्थना या उपासना की जाती थी।

प्रश्न 5. अजंता की किस गुफा में केवल संध्या के समय ही सूर्य की अंतिम किरणें प्रवेश कर पाती हैं?
उत्तर :
अजंता की पहली गुफा में केवल संध्या के समय ही सूर्य की अंतिम किरणें प्रवेश कर पाती हैं।

बोधमूलक प्रश्न:

(क) अजंता के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
अजंता प्राकृतिक सुंदरता के लिए बहुत प्रसिद्ध है। नीचे एक नदी बहती है, जिसमें बड़े-बड़े पत्थर हैं। पानी इन पत्थरों से टकराकर गुफाओं के नीचे एक कुंड में जमा हो जाता है। घाटी में चारों ओर हरसिंगार के पेड़ हैं। यहाँ कई तरह के फूल और फल भी उगते हैं। रंग-बिरंगे पक्षी यहाँ हमेशा दिखाई देते हैं।

(ख) अजंता के चित्र निर्माण की विधि का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :
अजंता में चित्र बनाने की विधि इस प्रकार थी। जिस दीवार पर चित्र बनाना होता था, उस पत्थर को पहले तोड़कर खुरदरा बना दिया जाता था। फिर उस पर गोबर, पत्थर का चूना और धान की भूसी मिलाकर गारा लगाया जाता था। इसके ऊपर चूने का पतला पलस्तर चढ़ाया जाता था। फिर उस पर लाल रंग की रेखाओं से चित्र की रूपरेखा बनाई जाती थी और बाद में उसमें रंग भरे जाते थे। हल्का साया देकर चित्रों में गोलाई, उभार और गहराई दिखाई जाती थी। हाथ की मुद्राओं, आँखों की चितवन और अंगों की लचक से चित्रों में भाव प्रकट किए जाते थे।

(ग) अजन्ता की सोलहवीं गुफा के दो चित्रों का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
सोलहवीं गुफा के दो चित्र बहुत प्रसिद्ध हैं। एक चित्र में दिखाया गया है कि गहरी रात में भगवान बुद्ध घर छोड़कर जा रहे हैं। यशोधरा और उनका पुत्र राहुल सो रहे हैं। पास की दासियाँ भी सोई हुई हैं। बुद्धदेव उन सबको देखते हुए दिखाए गए हैं। उनकी आँखों में मोह-ममता नहीं, बल्कि त्याग का भाव है।

दूसरे चित्र में एक मरती हुई राजकुमारी का चित्र है। उसकी मरने की अवस्था और आसपास खड़े लोगों का दुख देखकर दर्शकों का हृदय पिघल जाता है।

(घ) अजन्ता की सत्रहवीं गुफा के माता-पुत्र के चित्र का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
इस चित्र में एक माता अपने पुत्र को किसी व्यक्ति के सामने विनम्रता से प्रस्तुत कर रही है। पुत्र भी हाथ जोड़कर उस व्यक्ति के सामने खड़ा है। चित्र के सामने एक महान पुरुष खड़े हैं, जिनके हाथ में भिक्षा-पात्र है।

कहा जाता है कि बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद जब भगवान बुद्ध कपिलवस्तु लौटे, तब यशोधरा उनके सामने अपने पुत्र राहुल को लेकर आईं। वह उनसे बढ़कर और कौन-सी भिक्षा दे सकती थीं। इसी दृश्य को इस गुफा में दिखाया गया है  इस चित्र में आत्म-समर्पण का अद्भुत भाव दिखाई देता है।

(ङ) जिन जातक कथाओं पर अजन्ता की चित्रकला आधारित है, उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर :
अजन्ता की चित्रकला कई जातक कथाओं पर आधारित है। चम्पेय जातक कथा में बोधिसत्व ने एक बार नागराज के रूप में जन्म लिया था। चित्र में नागराज सिंहासन पर बैठे काशी के राजा को उपदेश देते हुए दिखाए गए हैं।

छद्दंत जातक कथा में बोधिसत्व एक जन्म में छह दाँतों वाले सफेद हाथी थे। इस चित्र में गजराज राजकुमारी को क्षमा का उपदेश देते हुए दिखाए गए हैं। चित्र इतने सुंदर और जीवंत हैं कि वे सजीव लगते हैं।

एक अन्य जातक चित्र में लगभग तीन सौ चेहरे दिखाई देते हैं। एक जगह आकाश में उड़ते हुए देवगायकों का भी सुंदर चित्र बनाया गया है।

निर्देशांनुसार उत्तर दीजिए :

(क) कला की अभिव्यक्ति के लिए जिन लोगों ने ऐसे अपूर्व स्थान को चुना उनके चरणों में शत-शत प्रणाम है।

प्रश्न 1. यह पंक्ति किस पाठ से उद्धृत है?

उत्तर :
यह पंक्ति ‘अजंता की चित्रकला’ पाठ से उद्धृत है।

प्रश्न 2. इस पंक्ति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
अजंता की मूर्तिकला, चित्रकला और वास्तुकला को देखकर लेखक बहुत प्रभावित हो जाते हैं। वे इन कलाओं की सुंदरता और महानता को देखकर कलाकारों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं। लेखक का कहना है कि जिन लोगों ने अपनी कला को साकार करने के लिए इतने सुंदर और अनोखे स्थान का चयन किया, वे सचमुच सम्मान के योग्य हैं। इसलिए लेखक उनके चरणों में प्रणाम करता है।

(ख) ‘उनके लिए चारों ओर कुछ है ही नहीं या हो ही नहीं रहा है।’

प्रश्न 1. ‘उनके लिए’ किसे संकेतित किया गया है?
उत्तर :
यहाँ ‘उनके लिए’ भगवान बुद्ध को संकेतित किया गया है।

प्रश्न 2. इस पंक्ति का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
इस पंक्ति का अर्थ है कि ‘काम’ की सेना भगवान बुद्ध को घेरकर उन्हें परेशान करना चाहती है। भयानक रूप और सुंदर स्त्रियाँ अलग-अलग तरीकों से उन्हें साधना से हटाने की कोशिश करती हैं। लेकिन भगवान बुद्ध अपने ध्यान में पूरी तरह लीन हैं। उन पर इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनके लिए वहाँ की ये सारी चीजें कोई महत्व नहीं रखतीं। वे अपनी साधना में दृढ़ और अडिग बने रहते हैं।

(ग) ‘प्रत्येक भारतीय को अपने उन अज्ञात पूर्वजों पर गर्व है।’

प्रश्न 1. प्रस्तुत पंक्ति के लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति के लेखक का नाम राय कृष्णदास है।

प्रश्न 2. प्रत्येक भारतीय को किन पर गर्व है और क्यों?
उत्तर :
प्रत्येक भारतीय को अपने उन पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होंने अजन्ता के अद्भुत और दिव्य चित्र बनाए। इन महान कलाकारों ने इतना बड़ा कार्य किया, लेकिन कहीं भी अपना नाम नहीं लिखा। उन्होंने मानव हृदय के श्रेष्ठ और पवित्र भावों को चित्रों में जीवित कर दिया। इसलिए हर भारतीय को उन पर गर्व है।

भाषा बोध : 

1. निम्नलिखित शब्दों में उपसर्ग एवं मूल शब्द पृथक् कीजिए :

शब्दउपसर्गमूल शब्द
अपूर्वपूर्व
सुसंबद्धसुसंबद्ध
अद्वितीयद्वितीय
यथोचितयथाउचित
प्रवृत्तप्रवृत्त

 

2. निम्नलिखित शब्दों से प्रत्यय पृथक् कीजिए :

शब्दमूल शब्दप्रत्यय
गुफाएँगुफाएँ
पहाड़ियाँपहाड़इयाँ
गहराईगहरा
आन्दोलितआन्दोलनइत

 

3. निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए :

शब्दपर्यायवाची शब्द
प्रेमस्नेह, अनुराग, ममता
धैर्यसंयम, साहस, स्थिरता
पक्षीपंछी, खग, विहंग
घोड़ाअश्व, तुरंग, हय
हाथीगज, द्विप, करि
माताजननी, अंबा, मातृ

 

4. निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग वाक्य में कीजिए :

  1. वर्तुलाकार – तालाब का आकार वर्तुलाकार है।
  2. हस्त-कौशल – कारीगर ने अपने हस्त-कौशल से सुंदर मूर्ति बनाई।
  3. चित्ताकर्षक – अजन्ता की चित्रकला बहुत चित्ताकर्षक है।
  4. रमणीय – पहाड़ों का दृश्य अत्यंत रमणीय लगता है।

अजन्ता की गुफा पाठ का सारांश

इस पाठ में लेखक ने अजन्ता की गुफाओं और वहाँ बने सुंदर चित्रों का वर्णन किया है। अजन्ता की गुफाएँ महाराष्ट्र राज्य में स्थित हैं। फरदापुर गाँव से लगभग छह किलोमीटर दूर पहाड़ियों के बीच बघोरा नदी बहती है। नदी के अंतिम मोड़ पर एक ऊँचा टीला दिखाई देता है। इसी पहाड़ी में एक पंक्ति में बनी हुई गुफाएँ ही अजन्ता की गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में भक्ति, उपासना, प्रेम, धैर्य और कलाकारों के अद्भुत कौशल का सुंदर उदाहरण मिलता है।

प्राकृतिक सुंदरता की दृष्टि से अजन्ता बहुत ही सुंदर है। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य खासकर अक्टूबर से दिसंबर तक बहुत अच्छा लगता है। अजन्ता में कुल 29 छोटी-बड़ी गुफाएँ हैं। ये दो प्रकार की हैं – स्तूप गुफा और विहार गुफा।

स्तूप गुफा में प्रार्थना और उपासना की जाती थी। गुफा के अंतिम भाग में स्तूप बना होता है, जिसके चारों ओर घूमने की जगह होती है। उन्नीसवीं गुफा सबसे बड़ी स्तूप गुफा है और उसका द्वार बहुत भव्य है।

विहार गुफा भिक्षुओं के रहने और पढ़ाई के लिए बनाई जाती थी। सभी गुफाओं की मूर्तियाँ एक ही शैली में बनाई गई हैं। गुफा संख्या 11 लगभग छत्तीस मीटर अंदर तक काटी गई है, जिसका निर्माण बहुत ही आश्चर्यजनक है। ये सभी गुफाएँ गुप्त काल की हैं। कुछ गुफाओं के चित्र आज भी बचे हैं, जबकि कुछ टूट-फूट गए हैं।

अजन्ता के चित्र बनाने की विधि भी बहुत विशेष थी। चित्रों में गोलाई, उभार और गहराई साफ दिखाई देती है। पहली गुफा में भगवान को साधना में लीन दिखाया गया है। कोई भी उन्हें विचलित नहीं कर पाता। इस गुफा में केवल संध्या समय सूर्य की किरणें प्रवेश करती हैं।

चम्पेय जातक कथा के अनुसार बोधिसत्व ने नागराज के रूप में जन्म लिया था। उनका चित्र भी गुफा में बना है। सोलहवीं गुफा में भगवान बुद्ध के गृह त्याग का चित्र है। यशोधरा और राहुल सो रहे हैं और बुद्ध जी उन्हें देख रहे हैं। उनकी आँखों में मोह नहीं, बल्कि त्याग का भाव है। एक चित्र में मरती हुई राजकुमारी का दृश्य भी बहुत मार्मिक है।

सत्रहवीं गुफा में माता और पुत्र का सुंदर चित्र है, जिसमें यशोधरा अपने पुत्र राहुल को भगवान बुद्ध को भिक्षा के रूप में दे रही हैं। यह चित्र आत्म-समर्पण का अनोखा उदाहरण है।

छद्दंत जातक कथा में बोधिसत्व को छह दाँतों वाले सफेद हाथी के रूप में दिखाया गया है। एक बड़े चित्र में लगभग तीन सौ चेहरे दिखाई देते हैं। आकाश में दिव्य गायकों का चित्र भी बहुत सुंदर है।

इन अलौकिक चित्रों को देखकर मन आनंद से भर जाता है। इन महान कलाकारों ने इतना सुंदर काम किया, लेकिन अपना नाम कहीं नहीं लिखा। इसलिए हर भारतीय को अपने उन अज्ञात पूर्वजों पर गर्व है।

राय कृष्णदास का जीवन परिचय

राय कृष्णदास का जन्म 13 नवम्बर 1892 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका निधन 21 जुलाई 1980 को हुआ। वे हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, लेखक और कला-इतिहासकार थे।

राय कृष्णदास का जन्म वाराणसी के प्रतिष्ठित राय परिवार में हुआ था। उनका परिवार साहित्य और कला प्रेमी था। उनके पिता राय प्रह्लाददास हिन्दी प्रेमी थे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से पारिवारिक संबंध होने के कारण उनके घर में साहित्यिक वातावरण था। जयशंकर प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त के संपर्क में आने से वे बचपन से ही कविता लिखने लगे थे।

बारह वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो गया, जिससे उनकी स्कूली शिक्षा बाधित हुई। उन्होंने स्वाध्याय के द्वारा हिन्दी, अंग्रेज़ी और बंगला भाषा का गहन अध्ययन किया। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। अज्ञेय जी ने उन्हें ‘स्मरण का स्मृतिकार’ कहा है।

भारतीय कला के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने जनवरी 1920 में अपने खर्च से ‘भारतीय कला-परिषद्’ की स्थापना की। सन् 1950 में भारत कलाभवन की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान रहा, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक महत्वपूर्ण अंग है।

राय साहब का संबंध अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, नंदलाल बसु और काशी प्रसाद जायसवाल जैसे महान व्यक्तियों से था। जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त और निराला जैसे साहित्यकार भी उनसे परामर्श लेते थे।

कला और साहित्य के क्षेत्र में उनके महान योगदान के कारण भारत सरकार ने उन्हें 1963 में ‘पद्मभूषण’ और 1980 में ‘पद्मविभूषण’ से सम्मानित किया। उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि भी प्राप्त हुई और वे ललित कला अकादमी के फेलो भी रहे।

प्रमुख रचनाएँ

काव्य संग्रह – ब्रजरज (ब्रजभाषा), भावुक (खड़ी बोली)
कला संबंधी पुस्तकें – भारत की चित्रकला, भारत की मूर्तिकला
गद्यगीत – साधना (1916), छायापथ (1929), प्रवाह (1931)
संवादात्मक निबंध – संलाप (1925), प्रवाल (1929)
कहानी संग्रह – अनाख्या, सुधांशु, आँखों की थाह
अनुवाद – खलील जिब्रान की ‘दि मैड मैन’ का ‘पगला’ नाम से हिन्दी अनुवाद
संस्मरण – जवाहर भाई
संपादन – ‘कलानिधि’ (हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका)

राय कृष्णदास जी का जीवन कला, साहित्य और संस्कृति की सेवा को समर्पित था। उनके योगदान के कारण आज भी भारतीय कला और साहित्य जगत उन्हें सम्मान के साथ याद करता है।

कठिन शब्दों के अर्थ

  • निकट – पास
  • सर्पाकार – साँप के समान घुमावदार
  • घुमाव – मोड़
  • आभास – झलक या अंदाज़
  • वर्तुलाकार – गोल आकार का
  • गगनचुम्बी – बहुत ऊँचा
  • प्रासाद – महल
  • ठेठ – बिल्कुल अंत तक
  • हस्त-कौशल – हाथ की कला
  • अपूर्व – बहुत अनोखा
  • सुसंबद्ध – अच्छी तरह जुड़ा हुआ
  • श्रृंखला – कड़ी या क्रम
  • अद्वितीय – जिसका कोई दूसरा न हो
  • शिलाखंड – बड़ा पत्थर
  • कुंड – पानी जमा होने की जगह
  • अभिव्यक्ति – भाव प्रकट करना
  • शत-शत – बार-बार
  • भेद – प्रकार
  • प्रदक्षिणा – चारों ओर घूमना
  • भव्य – बहुत सुंदर और शानदार
  • भिक्षु – बौद्ध साधु
  • शिल्प – कला का काम
  • शैली – बनाने का तरीका
  • उत्कृष्ट – बहुत अच्छा
  • खंडित – टूटा हुआ
  • चित्रण – चित्र बनाना
  • चित्ताकर्षक – मन को आकर्षित करने वाला
  • यथोचित – उचित ढंग से
  • अवयव – अंग
  • मुद्रा – हाथ या शरीर की स्थिति
  • लोच – लचक
  • क्षुब्ध – परेशान
  • लुब्ध – लालच में पड़ा हुआ
  • विचलित – डगमगाना
  • आत्मानुरत – अपने ध्यान में मग्न
  • अंकित – बनाया हुआ
  • त्रिभंग – तीन जगह से झुका हुआ
  • तात्विक – गहरे विचार वाला
  • ओत-प्रोत – भरा हुआ
  • अर्धागिनी – पत्नी
  • उल्लेखनीय – ध्यान देने योग्य
  • अवश्यंभावी – जो होना निश्चित हो
  • मुमूर्ष – मरने की अवस्था में
  • विकलता – घबराहट
  • साग्रह – आग्रहपूर्वक
  • अंजलि – हाथ जोड़ना
  • पराकाष्ठा – चरम सीमा
  • सौतियाडाह – जलन
  • व्याध – शिकारी
  • मूर्छित – बेहोश
  • प्रतिघात – जोर का असर
  • सजीव – जीवित जैसा
  • अलौकिक – अद्भुत
  • उदात्त – ऊँचे और अच्छे भाव
  • नतमस्तक – सिर झुकाना
  • अज्ञात – जिसका नाम पता न हो

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