वृंद के दोहे का व्याख्या क्लास 6 ॥ वृंद के दोहे की व्याख्या क्लास 6 ॥ Vrind Ke Dohe Ki Vyakhya Class 6

पहला पद : 1
“नीकी पै फीकी लगै, बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत युद्ध में, नहिं सिंगार सुहात।। ”
शब्दार्थ :
नीकी – अच्छी, फीकी – बुरी / खराब लगने वाली, बिन – बिना, अवसर – समय / मौका, बात – वचन / कहना, बरनत – वर्णन करना, युद्ध – लड़ाई, नहिं – नहीं, सिंगार – श्रृंगार / सजावट, सुहात – अच्छा लगना / शोभा देना।
व्याख्या :
इस पद में कवि कहते हैं कि अगर कोई अच्छी बात भी गलत समय पर कही जाए, तो वह अच्छी नहीं लगती। वह फीकी और बेकार लगने लगती है। जैसे युद्ध के समय अगर कोई सिंगार (श्रृंगार) की बातें करने लगे, तो वह बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती। युद्ध के समय वीरता और लड़ाई की बातें ही उचित होती हैं।
इससे हमें सीख मिलती है कि हर बात को सही समय पर ही कहना चाहिए।
दूसरा पद : 2
“जाही ते कछु पाइये, करिये ताकी आस।
रीतै सरवर पर गये, कैसे बुझत पिआस।। ”
शब्दार्थ :
जाही ते – जिससे, कछु – कुछ, पाइये – प्राप्त हो / मिले, करिये – करनी चाहिए, ताकी – उसकी, आस – आशा / उम्मीद, रीतै – सूखा / खाली, सरवर – तालाब / जलाशय, पर – पर, गये – जाना, कैसे – किस प्रकार, बुझत – बुझती / शांत होती, पिआस – प्यास।
व्याख्या :
इस पद में कवि कहते हैं कि हमें उसी व्यक्ति या वस्तु से आशा रखनी चाहिए, जिससे कुछ मिलने की संभावना हो। अगर कोई व्यक्ति खाली तालाब (सूखा सरोवर) के पास पानी पीने जाए, तो उसकी प्यास कैसे बुझ सकती है?
अर्थात हमें हमेशा सही जगह और सही व्यक्ति से ही उम्मीद रखनी चाहिए।
पद – 3 :
“अपनी पहुँच विचारि कै, करतब करिये दौर।
तेते पाँव पसारिये, जेती लंबी सौर।। ”
शब्दार्थ :
अपनी – खुद की, पहुँच – सामर्थ्य / क्षमता, विचारि कै – सोचकर / विचार करके, करतब – काम / कार्य, करिये – करना चाहिए, दौर – संसार / व्यवहार, तेते – उतने ही, पाँव – पैर, पसारिये – फैलाना चाहिए, जेती – जितनी, लंबी – बड़ी / लंबाई वाली, सौर – चादर।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि वृंद हमें यह शिक्षा देते हैं कि मनुष्य को हमेशा अपनी सामर्थ्य (क्षमता) को देखकर ही काम करना चाहिए। जितनी हमारी शक्ति और साधन हों, उसी के अनुसार हमें अपने कर्तव्य पूरे करने चाहिए।
कवि उदाहरण देकर समझाते हैं कि जितनी लंबी चादर हो, उतने ही पैर फैलाने चाहिए। यदि हम चादर से अधिक पैर फैलाएँगे, तो हमें असुविधा होगी। इसी तरह यदि कोई व्यक्ति अपनी आय या क्षमता से अधिक खर्च करता है, तो उसे परेशानी का सामना करना पड़ता है।
पद – 4 :
“विद्या धन उद्यम बिना, कहा जु पावै कौन।
बिना डुलाये ना मिले, ज्यों पंखे का पौन।। ”
शब्दार्थ :
विद्या – ज्ञान / शिक्षा, धन – संपत्ति / दौलत, उद्यम – मेहनत / परिश्रम, बिना – बिना, कहा – कहाँ, जु – जो / भला, पावै – प्राप्त करे / पाए, कौन – कौन, डुलाये – हिलाए / चलाए, ना – नहीं, मिले – प्राप्त हो, ज्यों – जैसे, पंखे – हवा करने वाला पंखा, पौन – हवा।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि बताते हैं कि विद्या सबसे बड़ा धन है, लेकिन यह बिना मेहनत और प्रयास के नहीं मिल सकती। जो विद्यार्थी मेहनत नहीं करता, वह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।
कवि इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। जैसे पंखे को हिलाए बिना हवा नहीं मिलती, उसी प्रकार मेहनत किए बिना विद्या प्राप्त नहीं होती।
अर्थात हमें पढ़ाई में परिश्रम, प्रयास और लगन से काम करना चाहिए। आलसी व्यक्ति कभी भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।
पद – 5
“सबै सहायक सबल को, कोई न निबल सहाय।
पवन जगावत आग को, दीपहि देत बुझाय।। ”
शब्दार्थ :
सबै – सब, सहायक – मदद करने वाले / सहारा देने वाले, सबल – शक्तिशाली / बलवान, को – को, कोई – कोई भी, न – नहीं, निबल – निर्बल / कमजोर, सहाय – सहायता करने वाला, पवन – हवा, जगावत – भड़काती / बढ़ाती, आग – अग्नि, दीपहि – दीपक को, देत – देती है, बुझाय – बुझा देती है।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि वृंद बताते हैं कि इस संसार में अधिकतर लोग शक्तिशाली व्यक्ति का साथ देते हैं, जबकि कमजोर व्यक्ति की सहायता बहुत कम लोग करते हैं।
कवि इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। हवा (पवन) जब तेज चलती है तो आग को और भड़का देती है, लेकिन वही हवा छोटे दीपक को बुझा भी देती है।
अर्थ यह है कि जो व्यक्ति शक्तिशाली होता है, उसे और अधिक सहायता मिलती है। लेकिन जो व्यक्ति कमजोर होता है, उसे अक्सर लोग सहारा नहीं देते।
पद – 6
“कहूँ-कहूँ गुन ते अधिक, उपजत दोष सरीर।
मधुरी बानी बोलि कै, परत पींजरा कीर।। ”
शब्दार्थ :
कहूँ-कहूँ – कहीं-कहीं, गुन – गुण / अच्छाई, ते – से, अधिक – ज्यादा, उपजत – उत्पन्न होते हैं / पैदा होते हैं, दोष – बुराई / कमी, सरीर – शरीर, मधुरी – मीठी, बानी – वाणी / बात, बोलि कै – बोलकर, परत – पड़ जाता है / फँस जाता है, पींजरा – पिंजरा, कीर – तोता।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि कहते हैं कि कभी-कभी अधिक गुण भी दोष बन जाते हैं और व्यक्ति के लिए परेशानी का कारण बन जाते हैं।
कवि इसका उदाहरण तोते (कीर) से देते हैं। तोते की मीठी बोली ही उसके लिए मुसीबत बन जाती है। लोग उसकी मधुर आवाज़ से खुश होकर उसे पिंजरे में बंद करके पाल लेते हैं।
पद – 7
“दान दीन को दीजिए, मिटै दरिद की पीर।
औषधि वाको दीजिए, जाके रोग शरीर।। ”
शब्दार्थ :
दान – दान / सहायता, दीन – गरीब / जरूरतमंद, को – को, दीजिए – देना चाहिए, मिटै – मिटती है / दूर होती है, दरिद – दरिद्रता / गरीबी, पीर – दुख / कष्ट, औषधि – दवा, वाको – उसको, जाके – जिसके, रोग – बीमारी, शरीर – देह / शरीर।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि वृंद कहते हैं कि दान उसी व्यक्ति को देना चाहिए जो गरीब और जरूरतमंद हो। जब हम गरीब व्यक्ति की सहायता करते हैं, तो उसकी गरीबी और दुख कुछ हद तक कम हो जाते हैं।
कवि इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। जैसे दवा उसी व्यक्ति को दी जाती है जिसके शरीर में कोई रोग हो। यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ है, तो उसे दवा देने का कोई लाभ नहीं होता।
पद – 8
“दुष्ट न छाड़ै दुष्टता, बड़ी ठौर हूँ पाय।
जैसे तजत न स्यामला, विष शिव कंठ बसाय।। ”
शब्दार्थ :
दुष्ट – बुरा व्यक्ति, न – नहीं, छाड़ै – छोड़ता, दुष्टता – बुराई / बुरा स्वभाव, बड़ी – बड़ी, ठौर – जगह / स्थान, हूँ – भी, पाय – पाकर, जैसे – जिस प्रकार, तजत – छोड़ता, न – नहीं, स्यामला – काला रंग, विष – ज़हर, शिव – भगवान शिव, कंठ – गला, बसाय – रख लिया / धारण किया।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि कहते हैं कि दुष्ट (बुरे) व्यक्ति अपनी बुरी आदतों को आसानी से नहीं छोड़ता, चाहे उसे कितना भी अच्छा या सम्मानजनक स्थान क्यों न मिल जाए।
कवि इसे भगवान शिव के उदाहरण से समझाते हैं। जब शिवजी ने विष को अपने गले में धारण किया, तब भी उस विष की कालिमा (काला रंग) नहीं बदली।
इसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति भी अपनी बुराई नहीं छोड़ता, चाहे उसे कितना ही अच्छा वातावरण क्यों न मिल जाए।
पद – 9
पद :
प्रभु को चिन्ता सबन की, आपु न करिये ताहिं।
जनम आगरू भरत है, दूध मातृ-धन माहिं।।
शब्दार्थ :
प्रभु – ईश्वर, को – को, चिन्ता – चिंता / फिक्र, सबन – सबकी, की – की, आपु – स्वयं, न – नहीं, करिये – करना चाहिए, ताहिं – उसकी / उसकी ओर, जनम – जन्म, आगरू – पहले ही, भरत – भर देता है / उपलब्ध कराता है, दूध – दूध, मातृ – माँ का, धन – संपत्ति / धन, माहिं – में।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि वृंद ईश्वर की महानता और दया का वर्णन करते हैं। कवि कहते हैं कि भगवान सभी जीवों की चिंता करते हैं, इसलिए मनुष्य को अधिक चिंता नहीं करनी चाहिए।
ईश्वर सबके हित के बारे में सोचते हैं और सभी की रक्षा करते हैं। कवि इसका एक सुंदर उदाहरण देते हैं। जब कोई बच्चा जन्म लेने वाला होता है, तब भगवान पहले ही उसकी माँ के स्तनों में दूध भर देते हैं, ताकि जन्म लेते ही बच्चे को भोजन मिल सके।
इससे पता चलता है कि ईश्वर अपने सभी प्राणियों की पहले से ही व्यवस्था कर देते हैं और उनकी देखभाल करते हैं।
पद – 10
कबहूँ प्रीति न जोरिए, जोरि तोरिये नाहिं।
ज्यों तोरे-जोरे बहुरि, गाँठ परति गुन माहिं।।
शब्दार्थ :
कबहूँ – कभी भी, प्रीति – प्रेम / स्नेह, न – नहीं, जोरिए – ज़बरदस्ती जोड़ना / करना, जोरि – जोड़कर, तोरिये – तोड़ना, नाहिं – नहीं, ज्यों – जैसे, तोरे – तोड़ा हुआ, जोरे – फिर से जोड़ा हुआ, बहुरि – फिर / दोबारा, गाँठ – गाँठ / गांठ पड़ना, परति – पड़ जाती है, गुन – धागा / रस्सी, माहिं – में।
व्याख्या :
इस दोहे में कवि वृंद प्रेम और मित्रता के संबंधों के बारे में शिक्षा देते हैं। कवि कहते हैं कि प्रेम संबंध बहुत सोच-समझकर बनाना चाहिए। यदि एक बार प्रेम या मित्रता का संबंध बना लिया जाए, तो उसे तोड़ना नहीं चाहिए।
कवि इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। जैसे रस्सी टूट जाने पर जब उसे फिर से बाँधा जाता है, तो उसमें गाँठ पड़ जाती है। उसी प्रकार यदि प्रेम या मित्रता का संबंध टूट जाए और बाद में फिर से जोड़ा जाए, तो उसमें पहले जैसा विश्वास और मिठास नहीं रहती।
इसलिए हमें अपने प्रेम और मित्रता के संबंधों को संभालकर रखना चाहिए।
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