इनसे सीखो कविता का व्याख्या क्लास 6 ॥ इनसे सीखो कविता का भावार्थ ॥ Inse Sikho Kavita Ka Vyakhya

इनसे सीखो कविता का व्याख्या क्लास 6 ॥ इनसे सीखो कविता का भावार्थ ॥ Inse Sikho Kavita Ka Vyakhya ॥ इनसे सीखो कविता का भावार्थ

इनसे सीखो कविता का व्याख्या क्लास 6 ॥ इनसे सीखो कविता का भावार्थ ॥ Inse Sikho Kavita Ka Vyakhya ॥ इनसे सीखो कविता का भावार्थ

इनसे सीखो कविता का व्याख्या
पद – 1

फूलों से नित हँसना सीखो
भौरों से नित गाना,
तरु की झुकी डालियों से नित
सीखो शीश झुकना।

शब्दार्थ :
नित – प्रतिदिन, भौरों – भँवरे, तरु – वृक्ष, डालियाँ – शाखाएँ, झुकी – नीचे की ओर झुकी हुई, शीश – सिर/मस्तक, झुकना – नम्र होना।

संदर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘साहित्य मेला’ के ‘इनसे सीखो’ नामक पाठ से ली गई हैं। इस कविता में कवि बच्चों को प्रकृति से अच्छी बातें सीखने की प्रेरणा देता है।

व्याख्या :
कवि बच्चों से कहता है कि उन्हें प्रकृति से अच्छी आदतें सीखनी चाहिए। जैसे फूल हमेशा खिले रहते हैं और सुंदर लगते हैं, इसलिए बच्चों को भी फूलों की तरह हमेशा खुश और प्रसन्न रहना चाहिए। भौंरे फूलों के पास गुनगुनाते रहते हैं, इसलिए उनसे हमें गाना और आनंदित रहना सीखना चाहिए। पेड़ की डालियाँ फलों के कारण नीचे झुक जाती हैं, इसलिए उनसे हमें नम्र और विनम्र बनना सीखना चाहिए। इस प्रकार कवि का संदेश है कि बच्चों को जीवन में हमेशा खुश रहना, आनंदित रहना और विनम्र स्वभाव अपनाना चाहिए।

पद – 2

सूरज की किरणों से सीखो
जगना और जगाना,
लता और वृक्षों से सीखो
सबको गले लगाना।

शब्दार्थ :
सूरज – सूर्य, किरणों – प्रकाश की रेखाएँ, जगना – उठना/जागना, जगाना – दूसरों को उठाना या जागृत करना, लता – बेल, वृक्षों – पेड़, गले लगाना – प्रेम से अपनाना।

संदर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘साहित्य मेला’ के ‘इनसे सीखो’ नामक पाठ से ली गई हैं। इस कविता में कवि बच्चों को प्रकृति से अच्छी बातें सीखने की प्रेरणा देता है।

व्याख्या :
कवि बच्चों से कहता है कि उन्हें प्रकृति से अच्छी आदतें सीखनी चाहिए। जैसे सूर्य की किरणें सुबह होते ही फैल जाती हैं और सबको जगाती हैं। उसी तरह बच्चों को भी सुबह जल्दी उठना चाहिए और दूसरों को भी जागने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

इसी प्रकार लता और वृक्ष एक-दूसरे से लिपटकर रहते हैं। उनसे हमें यह सीख मिलती है कि हमें भी सबके साथ प्रेम और स्नेह से रहना चाहिए। बच्चों को आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए और एक-दूसरे को प्यार से गले लगाना चाहिए। इस प्रकार कवि का संदेश है कि बच्चों को समय पर जागना, दूसरों की मदद करना और सबके साथ प्रेम से रहना सीखना चाहिए।

पद – 3

दीपक से सीखो जितना
हो सके अंधेरा हरना,
पृथ्वी से सीखो जीवों की
सच्ची सेवा करना।

शब्दार्थ :
दीपक – दिया/प्रकाश देने वाला दीप, अंधेरा – अँधकार, हरना – दूर करना, पृथ्वी – धरती, जीवों – सभी प्राणी, सच्ची सेवा – ईमानदारी से सेवा करना।

संदर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘साहित्य मेला’ के ‘इनसे सीखो’ नामक पाठ से ली गई हैं। इस कविता में कवि बच्चों को प्रकृति और वस्तुओं से अच्छी बातें सीखने की प्रेरणा देता है।

व्याख्या :
कवि बच्चों से कहता है कि उन्हें दीपक से सीखना चाहिए कि जितना संभव हो सके अंधकार को दूर करें। छोटा-सा दीपक भी अपने आसपास के अंधेरे को दूर करके प्रकाश फैला देता है। उसी प्रकार बच्चों को भी अपने अच्छे कार्यों से अज्ञान और बुराइयों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

इसके साथ ही कवि कहता है कि पृथ्वी से हमें सभी जीवों की सच्चे मन से सेवा करना सीखना चाहिए। पृथ्वी बिना किसी भेदभाव के सभी प्राणियों को भोजन, पानी और रहने का स्थान देती है। उसी तरह बच्चों को भी सभी लोगों और जीवों की मदद करनी चाहिए और सेवा भाव रखना चाहिए। इस प्रकार कवि का संदेश है कि बच्चों को दीपक की तरह दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाना और पृथ्वी की तरह सभी जीवों की सच्चे मन से सेवा करना सीखना चाहिए।

पद – 4

जलधारा से सीखो आगे
जीवन-पथ पर बढ़ना,
और धुएँ से सीखो हरदम
ऊँचे ही पर चढ़ना।

शब्दार्थ :
जलधारा – पानी की धारा/बहता हुआ जल, जीवन-पथ – जीवन का मार्ग, बढ़ना – आगे बढ़ना/प्रगति करना, धुएँ – आग से निकलने वाला धुआँ, हरदम – हमेशा, चढ़ना – ऊपर उठना।

संदर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘साहित्य मेला’ के ‘इनसे सीखो’ नामक पाठ से ली गई हैं। इस कविता में कवि बच्चों को प्रकृति से अच्छी बातें सीखने की प्रेरणा देता है।

व्याख्या :
कवि बच्चों को समझाता है कि उन्हें जलधारा से सीखना चाहिए। पानी की धारा हमेशा आगे की ओर बहती रहती है और कभी रुकती नहीं है। उसी तरह बच्चों को भी अपने जीवन के मार्ग पर लगातार आगे बढ़ते रहना चाहिए और अपने लक्ष्य को पाने का प्रयास करना चाहिए।

कवि आगे कहता है कि धुएँ से भी हमें एक अच्छी सीख मिलती है। जैसे आग से निकलने वाला धुआँ हमेशा ऊपर की ओर उठता है, वैसे ही बच्चों को भी जीवन में ऊँचा उठने और आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रकार कवि का संदेश है कि बच्चों को हमेशा अपने जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए और मेहनत करके उन्नति प्राप्त करनी चाहिए।

पद – 5

सत्पुरुषों के जीवन से सीखो
चरित्र निज गढ़ना,
अपने गुरु से सीखो बच्चों
उत्तम विद्या पढ़ना।

शब्दार्थ :
सत्पुरुषों – सज्जन और अच्छे लोग, चरित्र – आचरण/स्वभाव, निज – अपना, गढ़ना – बनाना या निर्माण करना, गुरु – शिक्षक, उत्तम – श्रेष्ठ, विद्या – ज्ञान/शिक्षा।

संदर्भ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘साहित्य मेला’ के ‘इनसे सीखो’ नामक पाठ से ली गई हैं। इस कविता में कवि बच्चों को अच्छे लोगों और गुरु से सीख लेने की प्रेरणा देता है।

व्याख्या :
कवि बच्चों से कहता है कि उन्हें अच्छे और सज्जन लोगों के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। सत्पुरुष अपने अच्छे आचरण और व्यवहार से समाज के लिए उदाहरण बनते हैं। इसलिए बच्चों को उनसे सीखकर अपना अच्छा चरित्र बनाना चाहिए।

कवि आगे कहता है कि बच्चों को अपने गुरु से अच्छी और श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए। गुरु हमें ज्ञान देते हैं और सही रास्ता दिखाते हैं। गुरु की शिक्षा से ही बच्चे जीवन में आगे बढ़ते हैं और सफल बनते हैं। इस प्रकार कवि का संदेश है कि बच्चों को अच्छे लोगों से प्रेरणा लेकर अपना चरित्र बनाना चाहिए और गुरु से उत्तम शिक्षा प्राप्त करके जीवन में उन्नति करनी चाहिए।

श्रीधर पाठक का जीवन परिचय

श्रीधर पाठक (1858–1928) हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग के प्रसिद्ध कवि थे। उनका जन्म 11 जनवरी 1858 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के जौंधरी गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित लीलाधर था। बचपन से ही उन्हें शिक्षा और साहित्य में रुचि थी। उन्होंने संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। आगे चलकर उन्होंने कोलकाता में सरकारी सेवा की और बाद में प्रयागराज (इलाहाबाद) में रहने लगे। 13 सितंबर 1928 को उनका निधन हो गया।

श्रीधर पाठक प्रकृति प्रेमी कवि थे और हिंदी में स्वच्छंदतावादी काव्यधारा के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में सुंदर कविताएँ लिखीं। उनकी कविताओं में प्रकृति का सुंदर चित्रण, देशप्रेम और समाज सुधार की भावना दिखाई देती है। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘कश्मीर सुषमा’, ‘भारत गीत’, ‘जगत सचाई-सार’, ‘मनोविनोद’ और ‘गोपिका-गीत’ शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने अंग्रेजी कवि गोल्डस्मिथ की रचनाओं का भी हिंदी में अनुवाद किया।

श्रीधर पाठक का स्वभाव सरल, विनोदी और उदार था। उनकी कविताओं की भाषा सरल और भावपूर्ण है। उन्होंने खड़ी बोली में मधुर शब्दों का प्रयोग करके उसे काव्य के योग्य सिद्ध किया। उनकी रचनाओं में देशप्रेम के साथ-साथ प्रकृति की सुंदरता का भी मनमोहक वर्णन मिलता है, इसलिए हिंदी साहित्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।

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