आवृत्ति वितरण क्या है- अर्थ, विधियां, निर्माण या तैयार करना तथा महत्व Frequency Distribution

आवृत्ति वितरण क्या है- अर्थ, विधियां, निर्माण या तैयार करना तथा महत्व Frequency Distribution, आवृत्ति वितरण क्या है और इसका निर्माण कैसे किया जाता है? बारंबारता वितरण क्या है समझाइए।

 

आवृत्ति वितरण क्या है  (frequency distribution kya hota hai)

मापन प्रक्रिया से प्राप्त प्रदत्तों प्राय: प्राप्तांकों के बड़े ढेर के रूप में होते हैं जिन्हें देखकर समूह के संबंध में किसी महत्वपूर्ण सूचना को प्राप्त करना कठिन होता है। इसके लिए संकलित प्रदत्तों को अर्थ युक्त बनाने तथा व्याख्या करने के लिए उन्हें संक्षिप्त व बोधमय रूप से सिलसिलेवार ढंग से व्यवस्थित करना ही आवृत्ति वितरण है। इसके लिए प्रदत्तों को वर्गीकृत किया जाता है। वर्गीकरण में प्रदत्तों को उनकी समानता तथा सादृश्यता के आधार पर कुछ क्रमबद्ध प्राप्तांक वर्गो अथवा श्रेणियों में बांटकर प्रस्तुत किया जाता है। वर्गीकृत प्रदत्त वास्तव में विभिन्न प्राप्तांक वर्गो तथा श्रेणियों की इन संख्याओं को आकृतियां अथवा बारम्बारता कहा जाता है। यही कारण है कि वर्गीकृत प्रदत्तों को प्राय: आवृत्ति वितरण अथवा बारंबारता वितरण के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है।

आवृत्ति वितरण का अर्थ Meaning of Frequency Distribution

 

 

आवृत्ति वितरण क्या है- अर्थ, विधियां, निर्माण या तैयार करना तथा महत्व Frequency Distribution

 

 

संख्याओं की आवृत्ति को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न वर्गों या समूहों में उनको प्रदर्शित करने की क्रिया को आवृत्ति वितरण कहते हैं।

आवृत्ति वितरण को निम्नलिखित उदाहरण से स्पष्ट किया गया है। मान लेते हैं कि किसी बुद्धि परीक्षा में 50 छात्रों के प्राप्तांक निम्नलिखित प्रकार से पाए गए हैं-
60  50  79  75  45  32  35  51  60  64

65  70  50  74  80  30  59  55  73  54

62  56  54  51  44  44  39  53  59  44

63  59  43  52  69  47  49  49  55  57

61  68  56  73  59  37  65  48  47  64

प्राप्तांकों को समूहबध्द करने की विधियां ( method of grouping series)

 

१. निषेधात्मक श्रृंखला (exclusive series)

80 – 85

75 – 80

70 – 75

65 – 70

60 – 65

55 – 60

50 – 55

45 – 50

40 – 45

35 – 40

30 – 35

निषेधक श्रृंखला के वर्गांतर 30 – 35 में 35 को सम्मिलित नहीं किया गया है। इसी प्रकार वर्गांतर 35 – 40 में 40 को सम्मिलित नहीं किया गया है। अतः इसे निषेधक श्रृंखला में 29.5 – 35.5 तक के सभी अंगों को सम्मिलित किया गया है।

२. शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला (pure classification series)

79.5 – 84.5

74.5 – 79.5

69.5 – 74.5

64.5 – 69.5

59.5 – 64.5

54.5 – 59.5

49.5 – 54.5

44.5 – 49.5

 

आवृत्ति वितरण का निर्माण (आवृत्ति वितरण तैयार करना)

अवर्गीकृत प्रदत्त को आवृत्ति वितरण के रूप में व्यवस्थित करके वर्गीकृत या समूहगत प्रदत्तों में परिवर्तित किया जा सकता है। समूहगत या वर्गीकृत प्रदत्त बोधगम्य तथा गणना कार्य के लिए अधिक सुविधाजनक होते हैं। आवृत्ति वितरण बनाने के लिए नियमित सपनों का अनुसरण करना होता है-

१. प्रसार ज्ञात करना:-

आवृत्ति वितरण बनाते समय सबसे पहला कार्य प्राप्तांकों का प्रसार ज्ञात करना है। प्रसार बताता है कि दिये गये प्राप्तांक अंक रेखा पर कितनी दूरी में फैले हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सबसे बड़े प्राप्तांक तथा सबसे छोटे प्राप्तांक के बीच की दूरी ही प्रसार कहलाती है। प्रसार ज्ञात करने के लिए
प्रदत्तों के उच्चतम प्राप्तांक में से निम्नतम प्राप्तांक घटाकर एक जोड़ दिया जाता है इसका सूत्र है-

सूत्र:-

प्रसार = (उच्चतम प्राप्तांक – निम्नतम प्राप्तांक) + 1

Rang = (Highest Score – Lowest Score) + 1

२. वर्गों की संख्या तथा आकार निर्धारित करना

प्रसार ज्ञात करने के उपरांत, इस प्रसार को कुछ छोटे-छोटे बराबर भागों में बांटा जाता है जिन्हें वर्ग कहते हैं। इन भागों की संख्या कुछ भी हो सकती है परंतु साधारणतः इन भागों अथवा वर्गों की संख्या 7 से 15 के बीच रखते हैं। परंतु यह कोई बाध्यकारी निश्चित नियम नहीं है। प्राप्तांकों की कुल संख्या अर्थात् N के आकार तथा प्राप्तांकों के प्रसार के अनुरूप आवश्यकता पड़ने पर 7 से कम अथवा 15 से अधिक वर्ग भी बनाए जा सकते हैं। वर्गों की संख्या 15 से अधिक रखने पर आवृत्ति वितरण काफी बड़ा हो जाता है, जिसके कारण वह सरल व बोधगम्य प्रतीत नहीं होता है। विशेषकर जब N छोटा होता है, वर्ग की संख्या 7 से कम रखने पर वर्गीकरण की त्रुटि के बढ़ जाने की संभावना बढ़ जाती है। जिसके फलस्वरूप विभिन्न मापांको की गणना में त्रुटि आ सकती हैं। वैसे तो वर्गांतर का मान कुछ भी रखा जा सकता है परंतु साधारणतः वर्गों का आकार अर्थात वर्गांतर का मान 2,3,5,10,15 या 20 रखते हैं। इन वर्गांत्तरों से प्राय: सभी प्रकार के प्रदत्तों को वर्गीकृत करना संभव हो जाता है।
आवृत्ति वितरण तालिका में विभिन्न वर्गों को प्रदर्शित करने की तीन विधियां हो सकती हैं ये हैं-

i. अपवर्जित विधि-
इस विधि में 1 वर्ग की उच्च सीमा उससे अगले वर्ग की निम्न सीमा बन जाती है। जैसे-
40 – 50 इसमें 40 व इससे किंतु 50 से कम वाले प्राप्तांक आते हैं।
30-40 इसमें 30 व इससे अधिक किंतु 40 से कम प्राप्तांक वाले आते हैं।
20-30 इसमें 20 व इससे अधिक किंतु 30 से कम वाले प्राप्तांक आते हैं।

ii. समावेशिक की विधि (Inclusive Method)-

इस विधि में एक ही सीमा को अगले वर्ग में दोहराते नहीं है जैसे-
40 – 49 इसमें 39.5 से लेकर 49.5 तक के प्राप्तांक होते हैं।
30 – 39 इसमें 29.5 से लेकर 39.5 तक के प्राप्तांक होते हैं।
20 – 29 इसमें 19.5 से लेकर 29.5 तक के प्राप्तांक होते हैं।

iii. वास्तविक सीमा विधि (Real Limits Method)
इस विधि के अंतर्गत वर्गों की वास्तविक सीमाओं के द्वारा वर्गों को प्रदर्शित करते हैं जैसे-
39.5 – 49.5 से 39.5 से 49.5 के प्राप्तांक रहते हैं।
29.5 – 39.5 से 29.5 से 39.5 के प्राप्तांक रहते हैं।
19.5 – 29.5 से 19.5 से 29.5 के प्राप्तांक रहते हैं।

वर्गों को प्रदर्शित करने की उपयोक्त वर्णित तीनों विधियों में दूसरी विधि अर्थात् समावेशिक विधि अधिक स्पष्ट तथा लिखने में सुगम है। यही कारण है कि वर्तमान में इस विधि का अधिक प्रचलन है।

३. वर्ग निर्धारित करना (Deciding the Classes)

सभी वर्ग एक सतत श्रृंखला में होने चाहिए भले ही बीच के किसी वर्ग में कोई भी प्राप्तांक न आता हो। वर्गों के निर्धारण करने में वर्गों का बनाना नीचे से ऊपर की ओर अर्थात आरोही क्रम में भी किया जा सकता है तथा ऊपर से नीचे की ओर अवरोही क्रम में भी किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि छोटे प्राप्तांकों वाला वर्ग नीचे तथा फिर क्रमशः बड़े प्राप्तांकों वाले वर्ग ऊपर बनाते हैं।

४. टैली चिह्न लगाना (Marking the Tallies)

वर्गों की संख्या निश्चित हो जाने के बाद उनका सारणीकरण करना चाहिए। इसका सामान्य नियम यह है कि सबसे नीचे सबसे कम प्राप्तांकों वाले वर्ग को लिखे जाते हैं। सब वर्गों को लिखने के बाद प्राप्तांकों की आवृत्तियों को ज्ञात किया जाता है, इसकी विधि यह है कि दिए हुए प्राप्तांकों जिस वर्ग में होता है उसके आगे के खाने में एक खड़ी रेखा (।) बना दी जाती है। इस रेखा को टैली मार्क(Tally Mark) कहते हैं। यदि किसी वर्ग के आगे 5 टैली चिह्न लगाने हैं, तो गणना की सुविधा के लिए चार खड़ी रेखाएं और एक रेखा को उनको काटते हुई

टैली चिह्न लगाना (Marking the Tallies)
बना दी जाती है।

 

५. आकृतियां ज्ञात करना (Calculating the Frequencies)

मिलान चिह्नों को लगाने के बाद उनको गिनना चाहिए ताकि आवृत्तियों अर्थात वर्ग में आने वाले छात्रों या प्राप्तांकों की पूर्ण संख्या मालूम हो जाए। टैली चिह्नों का प्रयोग वही होता है जो आवृत्तियों का होता है । आवृत्तियों के योग को ‘N’ (Numbers) द्वारा व्यक्त किया जाता है।

६. मध्यबिंदु निकालना (Mid point)

मध्य बिंदु निकालने का नियम यह है कि वर्ग के उच्चतम और न्यूनतम अंकों को छोड़कर 2 से भाग दे दिया जाता है।

आवृत्ति वितरण का महत्व

१. अव्यवस्थित अंक प्राय: निरर्थक होते हैं। अतः आवृत्ति वितरण द्वारा प्रदत्तों को समझने में सहायता मिलती है। आवृत्ति वितरण के अवलोकन से समूह के संबंध में स्पष्ट धारणा बन जाती है और निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकते हैं।

२. वर्गीकृत प्रदत्तों को रेखाचित्रों के द्वारा व्यक्त करके सरल व बोधगम्य बनाया जा सकता है। साधारण व्यक्तियों के लिए रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुत अंक अधिक उपयुक्त व सरलता से समझने योग्य होते हैं।

३. तुलनात्मक अध्ययन में सरलता मिलती है। सभी आंकड़ों को एक ही दृष्टि में देखकर उसकी तुलना कर सकते हैं।

४. विभिन्न सांख्यिकीय गणनाएं जैसे मध्य मान (mean), मध्यांक (Median), मानक विचलन (Standard deviation), सह संबंध गुणांक आदि गणनाएं आवृत्ति बनाकर सरलता वह शीघ्रता से की जा सकती हैं।
इस प्रकार आंकड़ों को व्यवस्थित करना सांख्यिकी की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।

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